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प्रतिबंधित क्षेत्र में खेती

8 वर्ष पहले
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योगेश पंडित . मंडरायल
एक ओर सरकार जहां विलुप्त होती घडिय़ाल प्रजाति को बचाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करते हुए विभिन्न योजना चला रही है। वहीं चंबल के राजघाट के दोनों किनारों के रेत ((बजरी)) के क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करते हुए इस क्षेत्र में सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी किए हुए हैं। परंतु मंडरायल के पास चंबल नदी के राजघाट पर क्षेत्र में चंबल के दोनों किनारों एवं बीच चंबल के पठार पर आसपास के लोगों द्वारा अवैध रूप से सरसों, चना की खेती की जा रही है। इसे न तो वन विभाग के आला अधिकारियों द्वारा इनसे इस चंबल की घडिय़ाल भूमि में अवैध खेती करने के बारे में पूछा जा रहा है।
अलग-अलग लोगों का है स्वामित्व
चंबल के दोनों किनारों पर एवं बीच में पठार पर आसपास के ग्रामीणों ने अपने खेत बना रखे हैं। इन्होंने इस भूमि पर मेड़बंदी करके अपना-अपना हक दर्शा रखा है। इस भूमि पर ये किसान चना, गेहूं एवं सरसों की फसल की बंपर पैदावार ले रहे हैं। वर्तमान में इस भूमि पर फसलें उगी हुई हैं।
पानी कम होते ही हो जाते हैं काबिज
चंबल में जब पानी अधिक आ जाता है तो चंबल के दोनों किनारों तक पानी भर जाता है। चंबल के बीच पठार भी इसमें डूब जाती है और किसान फसल पैदा नहीं कर पाते हैं। सर्दियों व गर्मियों में चंबल में पानी कम होने पर ये किसान फिर से अपने-अपने कब्जे वाले स्थान पर काबिज होकर खेती करना चालू कर देते हैं। इसके बाद कुछ किसान बजरी वाले हिस्से को कब्जे में लेते हुए उस पर सब्जियों की फसल बोना प्रारंभ कर देते हैं।
कैसे बचेगा अस्तित्व
जहां चंबल क्षेत्र को घडिय़ालों का प्रजनन क्षेत्र मानते हुए इस क्षेत्र पर सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाते हुए निगरानी को कर्मचारियों की नियुक्ति की हुई है। इससे घडिय़ाल की विलुप्त होती प्रजाति को बचाया जा सके। परंतु जब घडिय़ाल क्षेत्र में ही विभाग की उदासीनता से लोग खेती कर रहे हैं, तो घडिय़ाल के अस्तित्व को कैसे सुरक्षित माना जाएगा। इस घडिय़ाल की भूमि में ये किसान बेरोक-टोक खेती कर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। चंबल के दोनों किनारों एवं बीच में पठार बरसात दिनों में पानी भर जाता है। और सर्दियों में पानी कम होने पर इस पर खेती की जाती है। किसानों ने बताया कि बारिश पानी महीनों तक इस क्षेत्र में भरा रहने से इसमें फसलों का उत्पादन भी अधिक होता है। इससे किसान मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए फसलों का उत्पादन कर रहे हैं।