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विदेशी जिसकी सराहना करते नहीं थकते, उस पर हम मौन क्योंपर्यटन दिवस पर विशेष, संभावनाओं के बावजूद उपेक्षित हो रहे हैं हमारे पौराणिक स्थल एवं ऐतिहासिक धरोहरेंसंभावनाओं के बावजूद उपेक्षित...

8 वर्ष पहले
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एम.असलम - टोंक
जिले में पर्यटन की असीम संभावनाओं के बावजूद लंबे समय से उपेक्षा बरती जा रही है। कई पौराणिक एवं प्राचीन स्थल होने के बावजूद भी इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जबकि कई विदेशी यहां पौराणिक एवं कलात्मक ऐतिहासिक स्थल देखकर उसके प्रशंसा किए बगैर नहीं रहे। हालात ये हैं कि यहां की विश्व प्रसिद्ध सुनहरी कोठी लंबे समय से बंद पड़ी है। हाथी भाटा, बीसलदेव मंदिर, डिग्गी कल्याणधणी सहित कई ऐसे स्थल टोंक में मौजूद हैं जहां ध्यान दिया जाए तो इन पर्यटन क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बखूबी विकसित किए जा सकते हैं। विशेष दिवसों पर भी यहां पर्यटन एवं पुरासंपदा पर ध्यान नहीं दिया जाता। कुछ दिन पूर्व वन विभाग के उच्च अधिकारियों ने हाथीभाटा के आसपास डीयर पार्क आदि की संभावनाएं तलाश थीं। लंबे समय से बीसलपुर रिजर्व कंजर्वेशन पर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उसका मामला वित्तीय स्वीकृति में उलझा पड़ा है। पर्यटन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि टोंक के पर्यटन स्थलों के विकास के लिए फिलहाल कोई योजना नहीं है। नगर परिषद के अधिकारी इन क्षेत्रों के आसपास की उचित व्यवस्था किए जाने के आश्वासन देते रहे हैं। इस ओर लंबे समय से कदम नहीं उठ पा रहे हैं। यहीं कारण है कि काले हिरण होने के बावजूद रानीपुरा क्षेत्र के पास पर्यटन स्थल नहीं बन पाया। उपेक्षा के चलते काले हिरणों की संख्या भी कम होती जा रही है।
सुनहरी कोठी : विश्व सुनहरी कोठी का निर्माण 1824 में शुरू हुआ था। जो टोंक रियासत के चौथे नवाब के समय तक चला। इसमें सोने आदि की नक्काशी एवं कलात्मक आकर्षक कारीगरी की हुई है। इसकी देखरेख के लिए करीब 6 साल पूर्व 78 लाख का बजट राज्य सरकार ने दिया। अब तक कार्य पूरा नहीं होने के कारण ये कोठी बंद पड़ी है। इसकी कलात्मक नक्काशी देखकर कई विदेशी हैरान रह जाया करते थे।
क्या हो : सुनहरी कोठी के विकास के लिए उसका जीर्णोद्धार का कार्य जल्द पूरा हो। वहां बगीचा एवं पर्यटकों के बैठने आदि की व्यवस्था की जाए। जो कार्य अधूरा पड़ा है उसको शीघ्र पूरा किया जाए। इसके कार्य जो हुए हैं उनके उड़ रहे रंग रोगन की जांच की जाए।
हाथी भाटा : टोंक उनियारा रोड पर ककोड़ गांव के समीप ऐतिहासिक स्थल हाथी भाटा को कई दशकों से विकास का इंतजार है। इसके पास की खेड़ा की पहाडिय़ों में प्रागतिहासिक काल के शैलचित्र होने का दावा भी किया जा चुका है। टोंक के ककोड़ गांव के पास विशालकाय चट्टान को तराश कर बनाए गए हाथीभाटा के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया।
क्या हो : टोंक से सवाई माधोपुर रोड पर पडऩे वाले इस ऐतिहासिक स्थल के पास डीयर पार्क बनाकर इसे पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाया जा सकता है। साथ ही सवाई माधोपुर रोड पर एक विशाल द्वार बनाकर उसपर इसकी जानकारी देकर रणथंभोर देखने जाने वालों पर्यटकों को इस ओर आकर्षित किया जा सकता है।
अन्नपूर्णा गणेश मंदिर : ऐतिहासिक अन्नपूर्णा गणेश मंदिर हाईवे के समीप पहाड़ी पर स्थित है। मेरथवाल कायस्थ ने छावनी के पास एक पहाड़ी पर अन्नपूर्णा देवी का मंदिर बनवाया। यह मंदिर संवत 1816 से 1866 तक बनकर तैयार हुआ। वन विभाग ने कुछ वर्ष पूर्व इसके विकास के लिए कार्य किया। लेकिन उसके बाद से ही इसपर ध्यान दिया जाता नजर नहीं आ रहा है।
क्या हो : इस ऐतिहासिक स्थल के सामने स्थित ऐतिहासिक तालाब से इस मंदिर तक रॉक वे की मनोरंजक सुविधाएं देकर तथा इसके बाहर बड़ा बोर्ड लगाकर हाईवे से गुजरने वाले पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है।
राजमहल : बीसलपुर बांध के पास राजमहल एवं पौराणिक मंदिर पर्यटन की हैसियत से बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। बीसलदेव का मंदिर अपने आप में अनूठा इतिहास समाएं हुए हैं। इस क्षेत्र की कई विदेशी सैलानी सराहना भी करते रहे हैं। लेकिन इस ओर भी ध्यान नहीं दिया गया है।
क्या हो : राजमहल एवं बीसलपुर बांध क्षेत्र में पौराणिक मंदिर आदि को पर्यटन के रुप में विकसित किए जाने के लिए वहां तक पहुंचने के लिए सड़क व्यवस्था सहित द्वार बनाकर दिशा सूचक आदि बनाए जाने की जरूरत है। साथ ही वहां पर देशी विदेशियों के लिए बैठने एवं ठहरने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
हाड़ी रानी की कुंड : टोडारायसिंह में हाड़ी रानी का कुंड है। जहां फिल्मों की शूटिंग सहित ये अपने आप में एक अनूठी बावड़ी है। जो महल की तरह नजर आती है। टोडारायसिंह में अन्य ऐतिहासिक बावडिय़ां भी है। लल्ला पर्वत का किला भी मशहूर है। बावडिय़ां 1659-1661 में बनी बताई जाती है।
क्या हो : ऐतिहासिक हाड़ी रानी की कुंड तक पहुंचने के लिए आवश्यक सड़क व्यवस्था होने के साथ ही वहां पर पर्यटकों के बैठने एवं ठहरने की स्थान के साथ ही इसके प्रचार प्रसार के लिए हाईवे पर आवश्यक व्यवस्था की जाए।
अरबी फारसी शोध संस्थान : विश्व विख्यात अरबी फारसी शोध संस्थान जो विधिवत 1978 में स्थापित हुई। इसमें कई दुर्लभ ग्रंथ है। जो एक हजार साल से भी पुराने हैं। इसको देखने तथा यहां पर शोध करने के लिए करीब 50 देशों के लोग आ चुके हैं। कई हस्तलिखित ऐतिहासिक गं्रथ है।
क्या हो : इस संस्थान में चल रहे रिक्त पदों की भरपाई हो तथा यहां पर अरबी एवं फारसी कॉलेज एवं एकेडमी आदि खोलकर भी इसको आगे बढाने में योगदान दिया जा सकता है।
इन पर भी दिया जाए ध्यान : डिग्गी का कल्याणधणी मंदिर, शाही जामा मस्जिद, पुरानी टोंक में रजिया सुल्तान की मानी जाने वाली कब्र क्षेत्र सहित कई गंगा-यमुनी संस्कृति को मजबूत करने वाले स्थलों पर भी ध्यान दिए जाए। फ्रेजर ब्रिज, मालपुरा, निवाई के ऐतिहासिक स्थलों सहित देवली आदि में भी कई ऐतिहासिक स्थल हंै, जो पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।