ननिहाल ही नहीं, प्रताप की जन्मस्थली भी है पाली / ननिहाल ही नहीं, प्रताप की जन्मस्थली भी है पाली

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पाली की लाडली जैवंती बाई की कोख से जन्मे प्रताप के व्यक्तित्व को शौर्यवान और नीति निपुण...

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Jun 10, 2013, 10:32 AM IST
ननिहाल ही नहीं, प्रताप की जन्मस्थली भी है पाली
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पाली की लाडली जैवंती बाई की कोख से जन्मे प्रताप के व्यक्तित्व को शौर्यवान और नीति निपुण बनाने में ननिहाल की बड़ी भूमिका रही है। अपने रण कौशल के बूते शेरशाह सूरी को लोहे के चने चबाने वाले अखेराज इनके नाना थे। बताया जाता है कि हल्दी घाटी के युद्ध क्षेत्र में व्यूह रचना के तहत छाया की तरह साथ रहने और इनके रा'याभिषेक में मददगार रहे मानसिंह इनके मामा थे। संकट के क्षणों में उत्साह जगाने वाले पृथ्वीराज इनके मौसेरे भाई थे।
कई सबूत हैं पाली में प्रताप के जन्म के : मारवाड़ में बेटी का पहला जापा करवाने की प्रथा के कारण प्रताप का जन्म पाली में होना तो माना ही जाता है। इतिहासकार अर्जुनसिंह शेखावत तो जन्मपत्रियों के संदर्भ से इनका जन्म भी यहीं होना बताते हैं। इनके अनुसार जन्मपत्रियों में वर्णित अक्षांश व देशांतर रेखाओं की स्थिति से भी यही क्षेत्र इनका जन्म स्थान हो सकता है। प्रताप की जन्मपत्री चंडू पंचांग से बनी है। मूथ नैणसी ने भी ‘मारवाड़ की विगत’ में प्रताप का जन्म पाली में होना बताया है। महाराणा प्रताप जन्म स्थली विकास समिति पाली के अध्यक्ष एडवोकेट शैतानसिंह सोनगरा के अनुसार नामली ठिकाना के रावजी प्रेमसिंह की बही में भी प्रताप का जन्म पाली में होना लिखा है। प्रचलित परंपराओं में पुत्री की प्रथम प्रसूति पीहर में ही होती है, इसी धारणा से भी इन तथ्यों को बल मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार प्रताप को बचपन से ही ननिहाल का सानिध्य अधिक मिला। तत्कालीन राजनीतिक और कूटनीतिक हालात भी इसकी अप्रत्यक्ष वजह रही। ‘महाराणा प्रताप एंड हिज टाइम’ स्मारिका में लिखा है कि महाराणा प्रताप ने अपने पिता से बचपन में अवहेलना और उपेक्षित व्यवहार पाया था। कई विषय विशेषज्ञ भी मानते हैं कि उदयसिंह का जैवंती बाई से भी 'यादा भटियाणी रानी से प्रेम था। इसके परिणाम स्वरूप भी प्रताप के बचपन का कुछ समय पाली में बीता। अखेराज के शौर्य से जुड़ते कई किस्से आज इतिहास के स्वर्णिम हिस्सा बन गए हैं। इतिहास के एक प्रसंग के अनुसार शेरशाह सूरी से लडऩे के न्यौता की सूचना राव कूंपा ने एक रेबारी के हाथों अखेराज तक भेजी। उस समय वे तालाब ((जिसे आज लाखोटिया तालाब कहा जाता है)) में स्नान कर रहे थे। पराक्रम दिखाने के अवसर की जानकारी से उल्लासित होकर अखेराज ने अपने हाथों में पहने सोने के कड़े उतार कर रेबारी को बधाई स्वरूप दे दिए। स्वयं उदयसिंह द्वारा भी अखेराज द्वारा रणनीतिक सहयोग की अपील का जिक्र संदर्भ ग्रंथों में मिलता है। सुमेल-गिरी युद्ध में कौशल दिखाने की इनकी वीरता तो कालजयी है। प्रताप के व्यक्तित्व पर इन सबका प्रभाव हुआ। संघर्षों की तपिश झेलने की सीख तो संस्कारों से ही मिलती है। तत्कालीन हालातों में जैवंती कई के हाथों प्रताप की परवरिश को भी इतिहासकार बेमिसाल मानते हैं। इनकी बहन रतन बाई के पुत्र पृथ्वीराज ने भी समय-समय पर अपनी रचनाओं को इनकी ऊर्जा
को प्रवाह दिया।
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