- Hindi News
- ‘मन को धर्म में स्थिर करना दुष्कर कार्य है’
‘मन को धर्म में स्थिर करना दुष्कर कार्य है’
भास्कर न्यूज - पाली
जैन संत आचार्य रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि मनुष्य द्वारा अपने धन, वचन व काया को धर्म में लगाना आसान है, लेकिन मन को धर्म में स्थिर करना बहुत दुष्कर कार्य है। वे शुक्रवार को गुजराती कटला स्थित जैन उपाश्रय में मन की शुद्धि विषय पर प्रवचन दे रहे थे। संत ने कहा कि मन विचारों का उद्गम स्थल है जहां सदैव संकल्प-विकल्प, स्मृति-चिंतन और कल्पना के चलते ही मन मनुष्य के बंधन व मोक्ष का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि मन चंचल है वह वायु की तरह दौड़ता रहता है। मन जैसा विचार करता है वैसा शरीर वर्तन करता है। श्रावक अभय मेहता ने बताया कि आचार्य शुक्रवार को उपाश्रय से सुबह 7 बजे विहार कर महावीर नगर स्थित वासु पूज्य जैन मंदिर उपाश्रय में तीन दिवसीय स्थिरता में मातृ-पितृ भक्ति, क्रोध आबाद तो जीवन बर्बाद तथा आओ सामयिक करे विषय पर प्रवचन करेंगे। मेहता ने बताया कि इस क्रम में उपाश्रय में आचार्य यशो रत्नसूरी व पुण्य रत्नसूरी की निश्रा में बाल दीक्षार्थी संयम कुमार गांधी व उनके पिता का आचार्य रत्नसेन सूरीश्वर व चतुर्विध संघ की उपस्थित पाली जैन देवकी पेढ़ी के अध्यक्ष पारसमल भंसाली, सचिव रमेश संखलेचा व दिलीप मेहता, राजेंद्र लोढा और मिश्रीमल पोरवाल की ओर से तिलक लगाकर और श्रीफल भेंट कर जयकारों के साथ बहुमान किया गया।