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सरकारी अस्पतालों में बजट हुआ खत्म, उधार पर टिकी व्यवस्था

8 वर्ष पहले
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सीकर. स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था बजट के अभाव में पटरी से उतरने लगी है। हर काम उधार से चल रहा है। अब अधिकारियों ने निदेशालय व कलेक्टर को लिखा है कि पैसा खत्म हो गया है। जननी शिशु सुरक्षा योजना में प्रसूताओं को देने के लिए भी नहीं है। जिले को यहां व्यवस्था सुधार के लिए अब छह करोड़ रुपए चाहिए, जिसकी निदेशालय से डिमांड की जा चुकी है। सीएमएचओ व पीएमओ द्वारा आधा दर्जन से ज्यादा चिट्ठियां लिखी गई लेकिन कोई यह जवाब देने वाला नहीं है कि पैसा कब मिलेगा और उन्हें काम कैसे चलाना है। सरकार बदलने के बाद स्वास्थ्य विभाग को पर्याप्त बजट नहीं मिला। अक्टूबर-नवंबर में करीब तीन करोड़ रुपए मिले थे। 60 दिवसीय कार्य योजना और बताते हुए अस्पताल में सफाई, मरम्मत, गद्दे-चद्दरें, बैड की मरम्मत आदि कार्य और सौंप दिए। सब सेंटर से लेकर जिला अस्पताल तक दिसंबर महीने में खूब पैसा भी खर्च कर दिया गया। ब्लॉक में हर महीने औसत 9-10 लाख रुपए खर्च होते हैं लेकिन काम बढऩे से खर्चा 20 से 25 लाख रुपए तक हो गया। टीकाकरण, मासिक बैठक, ग्रामीण स्वास्थ्य समिति, एएनसी चेकअप आदि का भुगतान कर दिया गया। जब डिमांड हुई तो पता लगा कि सीएमएचओ कार्यालय में पैसे खत्म हैं और पीछे से ही बजट नहीं आया है। बाकी कार्य तो उधर से चल रहे हैं लेकिन प्रसूताओं को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि पर संकट आ गया है। सभी सीएचसी-पीएचसी व एसके अस्पताल तक का यही हाल है। सीएमएचओ डॉ बीएल सैनी का कहना है कि डिमांड भिजवाने के बाद कई चिट्ठी लिखी गई। शनिवार को भी उच्चाधिकारियों से बातचीत हुई है, उन्होंने आश्वासन दिया है कि जल्द ही बजट भिजवा देंगे।
॥बजट को लेकर बातचीत की जाएगी। देखा जाएगा कि कहां क्या दिक्कत आ रही है।
नीरज कुमार पवन, एडिशन मिशन डायरेक्टर, एनआरएचएम