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साहित्य वर्तमान का साक्षी व भविष्य का दस्तावेज

8 वर्ष पहले
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उदयपुर - साहित्य समाज का दर्पण मात्र नहीं है, उससे बहुत अधिक है और वह वर्तमान का साक्षी व भविष्य का दस्तावेज होता है। उक्त विचार सुविवि एवं राष्ट्रीय परीक्षण सेवा-भारत, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के साझे में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह के मुख्य वक्ता डॉ केके शर्मा ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अब जटिल काव्य के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। काव्य भाषा सरल व सहज होनी चाहिए। भाषा का स्वरूप अभिधामूलक होना चाहिए। समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. कैलाश सोडाणी ने साहित्य के बदलते स्वरूप और वर्तमान जीवन की प्रतिस्पद्र्धा को अभिव्यक्त किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय की गति बहुत तेज है, साहित्यकार में भी यह गति परिवर्तन होना आवश्यक है। नई सदी में बिना लर्निंग अर्निंग संभव नहीं है। विशिष्ट अतिथि डॉ हेतु भारद्वाज ने कहा कि आज समाज में व्यापक संस्कार व संवाद लगभग खत्म होने के कगार पर है एवं साथ ही रूढि़वादिता के इस दौर में व्यक्ति स्वयं को हताश व निराश पाता है । उन्होंने साहित्य को अलावता को दूर करने का एक प्रभावी उपाय बताया है।