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सुप्रीम कोर्ट में प्रशासन देगा जवाब

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - चंडीगढ़
शहर में जमीन के मुआवजे को लेकर प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट में जवाब देना होगा। जनवरी से मार्च माह में ही सुप्रीम कोर्ट में शहर की जमीन से जुड़े 45 मामलों में सुनवाई होने वाली है। इन सभी मामलों में जमीन के मालिकों ने अधिक मुआवजे के लिए प्रशासन के खिलाफ अपील की हुई है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पहुंचे अधिकांश मामले मनीमाजरा और इसकी आस पास के इलाके की जमीन है।
प्रशासन ने यह जमीन 1985 से 1995 के दौरान अधिगृहीत की थी। प्रशासन ने 1995 में मार्डन कांप्लेक्स की जमीन 116 रुपये प्रति वर्ग गज के हिसाब से अधिगृहीत की थी। जमीन का अधिग्रहण पुनर्वास योजना के नाम पर किया गया था लेकिन इसकी जगह एमआईजी और एचआईजी के मकान बना लिए। इसके बाद 1988 में 80 हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन का अधिग्रहण किया गया। वर्ष 1991 में प्रशासन ने 2 लाख रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन का अधिग्रहण किया। इसी वर्ष प्रशासन ने फारेस्ट एरिया के लिए भी 192 रुपये प्रति वर्ग गज के हिसाब से जमीन का अधिग्रहण किया। वर्ष 1997 में ग्रिड स्टेशन के लिए 260 रुपये प्रति वर्ग गज के हिसाब से जमीन का अधिग्रहण कर लिया। इन सब मामलों में जमीन मालिकों का तर्क है कि उन्हें मार्केट रेट से बहुत कम मुआवजा दिया गया। जमीन मालिकों ने होम मिनिस्ट्री की उस जांच रिपोर्ट का भी हवाला दिया है जिसमें प्रशासन द्वारा मार्केट रेट से कम मुआवजा देने की बात कही गई है। जमीन मालिकों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दलील यही है कि प्रशासन ने जमीन मालिकों को उचित मुआवजा नहीं दिया। जमीन मालिक प्रशासन से जमीन का मार्केट रेट देने की मांग कर रहे है। जमीन के मुआवजे को लेकर प्रशासन की जिला अदालत और हाईकोर्ट में भी फजीहत हो चुकी है। जिला अदालत ने तो जमीन का बढ़ा मुआवजा न देने पर प्रशासन के अफसरों की गाडिय़ां तक अटैच कर ली थी। मनीमाजरा के फार्मर हरदेव सिंह के अनुसार उन्हें पड़ोसी शहरों के मुकाबले जमीन का एक तिहाई रेट भी नहीं मिल रहा।