आज पॉलिटिक्स धन कमाने का प्रोफेशन है
अक्षय मिश्रा चंडीगढ़
शायरी आसमान से नहीं आती। वो तो एक पेड़ की तरह उगती है। शायरी के लिए समाज, संस्कृति, इतिहास और तहजीब चाहिए। शायर का दिल मुहब्बत के लिए धड़कता है तो जिंदगी की जरूरतों और आसपास की हकीकतों को भी समझता है। ऐसे में उसका पॉलिटिक्स से अलग रहना मुमकिन नहीं। समाज की ही एक ईकाई है राजनीति। इतिहास उठाकर देख लीजिए। महाभारत युद्ध से लेकर आज तक हर दौर में राजनीति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कुछ इस अंदाज में रचनाकार पदमश्री निदा $फाज़ली ने अपने मौजूदा पॉलिटिकल सीनेरियो पर अपने विचार व्यक्त किए। वे मंगलवार को जश्न-ए-हरियाणा कुलहिंद मुशायरा में हिस्सा लेने शहर आए थे। यह पूछने पर कि क्या केजरीवाल ने सीनेरियो को बदल डाला है? उन्होंने कहा-अन्ना हजारे का मूवमेंट, अरविंद केजरीवाल के उदय ने देश की अवाम को जोड़ा है। पं. नेहरू के समय से चली आ रही राजनीति में अब बदलाव आया है। जनता सड़क पर उतरना सीख गई है। वर्तमान राजनीति का चरित्र ‘सेंसेटाइजेशन’ है। आज पॉलिटिक्स ऐसी है कि कब माचिस की डिबिया में बैठ कर आपके घर पहुंच जाए पता नहीं नहीं चलता। मॉडर्न पॉलिटिक्स एक ऐसा प्रोफेशन है जो धन कमाने का सबसे बेहतर माध्यम है। आप इस बदलाव को कैसे देखते हैं? निदा कहते हैं-आज एक अल्पमत की पार्टी सरकार बनाती है क्योंकि कांग्रेस के पास मोदी से लडऩे का कोई हथियार नहीं था। केजरीवाल वो हथियार बनकर सामने आए, यही वजह है कि आज भाजपा को केजरीवाल का डर है। उन्होंने बिना पैसे, बिना मैनपावर पूरी सियासत बदलकर रख दी। यह संकेत है कि अवाम की आंखें खुल चुकी हैं। आज शायर, साहित्यकार के सामने चुनौतियां क्या हैं? इस पर उनका कहना था- तुलसीदास के जमाने में शब्द और श्रोता के बीच कोई नहीं होता था।
आज शब्द और श्रोता के बीच सिनेमा, क्रिकेट, और ना जाने क्या क्या है। पॉलिटिक्स ने भी शब्दों के अर्थ बदले हैं। जाहिर है ऐसे में साहित्यकार की चुनौती बढ़ जाती है। उसके पास दो ही चीजें बचती हैं। एक तो राजनीति से उन शब्दों को छीन ले, या फिर उन शब्दों को उनका मौलिक अर्थ वापस दिला दे। शब्द हमेशा से ही राजनीति के लिए खतरा रहे हैं। यही वजह है कि पॉलिटिक्स ने मोहब्बत, इंसानियत जैसे कई सार्थक शब्दों के अर्थ बदल दिए।