कहानी का हर शब्द संवाद है
भास्कर न्यूज - चंडीगढ़
नाटक करने के लिए दो ही चीजों की जरूरत होती है। एक एक्टर और दूसरा टेक्स्ट। यदि एक्टर और कहानी अ\\\'छे नहीं होंगे तो आप एक अ\\\'छा प्ले तैयार नहीं कर सकते। कुछ इस अंदाज में प्ले डायरेक्टर देवेंद्र राज अंकुर ने थिएटर से जुड़े अपने एक्सपीरियंस और प्रयोगों के बारे में बताया। वे 9 वें टीएफटी नेशनल विंटर थिएटर फेस्टिवल में हिस्सा लेने शहर आए हुए थे। अंकुर ने बताया कि 1975 में मैंने थिएटर की दुनिया में नया ट्रेंड शुरु किया था। इसमें मैंने कहानियों पर प्ले तैयार करने शुरु किए और ‘कहानियों का रंगमंच’ नाम दिया। इसकी एक वजह यह भी थी, आज भी हम पुराने नाटकों का ही मंचन करते आ रहे हैं। हमारे पास नया कुछ भी नहीं है। इसलिए अ\\\'छे लेखकों की शॉर्ट स्टोरीज़ को मैंने रंगमंच पर खेलना शुरु कर दिया। इसकी सबसे अ\\\'छी बात यह है कि आपको कहानी को मंच पर नेरेट करने के लिए किसी तरह अतिरिक्त संवादों की जरूरत नहीं होती। जिस अंदाज में कहानी लिखी गई है, उसी तरह उसे मंच पर प्रस्तुत करने से कहानी की मौलिकता बनी रहती है। दूसरी तरफ कहानी का हर शब्द एक संवाद होता है, इसलिए इसमें किसी अलग तरह के डायलॉग लिखने की जरूरत नहीं पड़ती। वे बताते हैं कि मुझे अपने नाटकों के लिए किसी खास तरह के स्टेज की जरूरत ही नहीं पड़ी। मैं प्ले में वहीं चीजें रखता हूं, जो कहानी की जरूरत होती है। मेरा \\\'यादा फोकस कहानी और अभिनय पर होता है। जब लोग कहानी को मंच पर \\\'यों की त्यों उतरते देखते हैं, तो और खूबसूरत दिखती है।