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इतिहास खंगालने से खुल सकते हैं कई अहम एेतिहासिक राज
पिंजौरअपने अंदर हजारों वर्ष पुराने प्राचीन इतिहास को संजोए हुए है। यहां जगह जगह प्राचीन इतिहास के अवशेष आज भी खुदाई के दौरान देखे जा सकते हंै। माना जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास के दौरान अज्ञातवास के 365 दिन यहीं बिताए थे, जिसका परिणाम आज भी पिंजौर में वे 365 बावड़ियां हैं, जो कि उस समय पांडव प्रतिदिन पानी पीने के लिए खोदतेे थे। कहते हैं पांडवों को पानी में जहर के भय से उन्हें प्रतिदिन नई बावड़ी खोदनी पड़ती थी। हैरानी की बात है कि आज जितनी भी बावड़ियां बची हैं, उनमें आज भी पानी हर समय चलता रहता है।
पांडवकाल के समय से ही यहां पर एक शिव मंदिर है, जिसके पास ही एक धारामंडल है जिसमें द्रोपदी स्नान करती थी, जिसे द्रोपदी कुंड भी कहा जाता है। इसमें अब महिलाएं स्नान करती है। भूमिगत बना यह द्रौपदी कुंड भी प्राचीन काल से पुराने पत्थरों से ही बना हुआ है। माना जाता है कि उस समय पांडवों द्वारा इस कुंड के ऊपर छत बनाई जा रही थी, परन्तु भविष्यवाणी के मुताबिक सूरज निकलने के बाद यह छत नहीं पड़ सकती थी। वहीं हुआ सूरज निकलने पर इसकी छत नहीं पड़ी। आज भी इस धारामंडल में वही प्राचीन पत्थरों के पिलर खड़े हुए हैं परन्तु उन पर छत नहीं है। इसी कुंड के अन्दर से प्राचीन समय से करीब 6 फीट ऊंची सुरंग भी बनी हुई है, जिसे लगभग 50 वर्ष पहले बंद कर दिया गया और दोबारा किसी ने भी इसे खोलकर इसका राज जानने की कोशिश नहीं की गई। पिंजौर के पुराने बाशिंदे पूर्व पंच पुराने परोहित पंडित राजेन्द्र शर्मा और पूर्व सरपंच संत कुमार ने बताया कि जब वे छोटे थे, तब उनके बुजुर्ग इस सुरंग में रोशनी लेकर अन्दर गए थे। उन्होंने बताया था कि सुरंग के कुछ मीटर पर दो रास्ते निकलते हैं। एक गार्डन की तरफ और दूसरा शिमला की तरफ। उन्हांेने बताया कि रोशनी बंद होने पर वे वापस गए। 50 वर्ष पहले इस सुरंग को पत्थरों से बंद कर दिया गया। बाद में इसमें से सांप, बिछु और जहरीले जीव निकलने पर इसे सीमेंट से पक्का ही बंद कर दिया गया, जिससे इसके साथ ही इसका राज भी बंद हो गया। पंडित राजेन्द्र शर्मा ने बताया कि सुरंग का जो सिरा शिमला की तरफ जाता है, हो सकता है वह कंडाघाट करोलबाग में जाकर निकलता हो, क्योंकि कंडाघाट के पास पानी के एक चोए में जो कुछ भी डालते हैं, वह तीन दिन बाद धारामंडल में आकर निकलता है। इसे चेक भी किया जा चुका है। परोहित शर्मा ने बताया कि इस धारामंडल और सुरंग के राज की जानकारी वे चंडीगढ़ के पूर्व गवर्नर जैकब और हरियाणा के पूर्व गवर्नर एआर किदवई के अलावा कई नेताओ को दे चुके हैं। उन्होंने बताया कि द्रौपदी कुंड में लगे प्राचीन पत्थरों और पिलरो पर अज्ञात लिपि में कुछ लिखा हुआ है जिसे देश विदेश से आए वैज्ञानिको ने भी देखा परन्तु कुछ भी पढ़ा नहीं गया। पूर्व सरपंच संत कुमार और पंडित राजेन्द्र शर्मा ने सरकार से मांग करते हुए कहा कि वर्षों से दफन पड़े इस सुरंग के रहस्य की वैज्ञानिक खोज करवाकर प्राचीन इतिहास को खंगाला जाए, ताकि इससे देश विदेश से आने वाले पर्यटकों को इससे परिचित कराया जा सके। उन्होंने कहा कि सरकार, प्रशासन और इस स्थल के संचालकों ने भी इस प्राचीन और एतिहासिक स्थल पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिससे इसकी जमीन पर वर्षो पुराने कब्जे हो गए। अगर अब भी ध्यान नहीं दिया गया तो यह प्राचीन ढांचा लोगों की दुकानो और मकानों में ही लुप्त हो जाएगा। इस धारामंडल पर अक्षर तृतीय और सत्वातीज अमावसय वैसाखी काे मेला लगता है जिसमें हरियाणा के अलावा पंजाब, हिमाचल प्रदेश, यूपी अन्य राज्योंसे हजारों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं।
धारामंडल में वर्षों से बंद पड़ी सुरंग।