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खेल मैदान होने से कम्प्यूटर और मोबाइल के अंदर खेलों के लिए सिमटकर रह गए युवा
हरियाणामेंआई हर सरकार द्वारा प्रदेश के युवाओं को खेलों में आगे बढ़ने का प्रोत्साहन करने का दावा किया जाता रहा है, परन्तु पिंजौर शहर में सरकार के इस दावे पर आज तक किसी ने भी कोई अमल नहीं किया क्योंकि पिंजौर शहर का युवा वर्ग आज शहर में कोई खेल मैदान होने के कारण खेलों के लिए कम्प्यूटर और मोबाइल तक ही सिमटकर रह गया है। युवा वर्ग के अलावा अगर हम छोटे बच्चों की बात करें तो उन्हें भी खेलने के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है, क्योंकि शहर में कोई भी पार्क नहीं हैं, जहां बच्चे खेल सकें, इसलिए उन्हें अपने घरों के बाहर गली में जहां वाहनों की आवाजाही हर समय रहती है, वहीं खेलना पड़ता है। वाहनों की दुर्घटना का उन पर हर समय खतरा बना रहता है। पिंजौर निगम के 3 वार्ड हैं। उनमें से वार्ड 5 की हाउसिंग बोर्ड काॅलोनी को छोड़कर केवल वार्ड 4 में छोटा सा पार्क है, जिसकी हालत इतनी बुरी है कि वहां खेलना तो दूर खड़ा होना भी मुश्किल है। पिंजौर के इन वार्डों में युवाओ के खेलने के लिए कोई भी खेल मैदान नहीं है, जबकि पहले नगरपालिका तो अब नगरनिगम की शहर में सैकंड़ों बीघा जगह है, जिसकी करोड़ों की जमीन पर लोगों और भू-माफिया द्वारा कब्जे कर रखे हैं, जिन्हें खाली करवाने में पहले तो नगरपालिका ने कोई रुचि दिखाई। अब ही उसे खाली करवाने में नगर निगम कोई कार्रवाई कर रहा है। स्थानीय दलीप वर्मा, राजेश चोपड़ा, कुलदीप सिंह और बलदेव सिंह आदि ने कहा कि हर वार्ड में सरकार की बहुत ज्यादा जगह है। अगर प्रशासन उसे खाली करवाकर वहां बच्चे के लिए पार्क या धर्मशाला आदि लोगों के लिए बनवा दें।
दो वर्ष पहले रतपुर काॅलोनी ट्रेन की पटरी के पास एक छोटा सा मैदान था। उस समय वहां पर प्रतिदिन सुबह शाम को क्रिकेट खेलने के लिए जाते थे, परन्तु धीरे धीर अब वहां भी मकान बनने के कारण अब खेलना ही बंद कर दिया। पिंजौर वन विभाग के परिसर में एक मैदान है, परन्तु वहां छुटी वाले दिन ही खेल सकते हैं। उसके अलावा वहंा भी रोक दिया जाता है। प्रशासन को युवाओं के खेलने के लिए मैदान का प्रबन्ध करवाना चाहिए, ताकि युवाओं को दिक्कत हो और उन्हें खेलने की जगह मिल जाए और दूर जाना पड़े।
-नरेन्द्रधीमान पिंजौर
जब से पिंजौर विकसित हो रहा है, यहां पर खुली जगह ही समाप्त होती जा रही है। पहले तो क्रिकेट फुटबाल आदि खेलने के लिए कहीं कहीं खुली जगह मिल जाती थी, परन