- Hindi News
- दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए 93 बार किया रक्तदान
दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए 93 बार किया रक्तदान
दूसरोंकीजिंदगी बचाने का जज्बा लेकर जीरकपुर के अरुण कौशल ने अब तक 93 बार रक्तदान किया है। उनको इस काम को करने की प्रेरणा हैंडीकैप्ड लोगों से मिली। तब से अब तक वो लगातार रक्तदान करते आए हैं। वो कोई भी मौका नहीं छोड़ते ब्लड डोनेट करने का। उनको बस इंतजार होता है डॉक्टर के कहे अनुसार तीन महीने बीत जाने का। डाॅक्टर के अनुसार तीन महीने बाद आप फिर से ब्लड डोनेट कर सकते हैं। उनको पंजाब सरकार ही नहीं चंड़ीगढ़ प्रशासक, दिल्ली प्रशासन, कई समाजिक धार्मिक संस्थानों से लेकर कई केंद्रीय मंत्रियों ने अरुण को सम्मानित किया है। अरुण कौशल केवल आम जनता के लिए ही नहीं बल्कि देश के लड़ने वाले सैनिकों को भी ब्लड डोनेट कर चुके हैं। काैशल मानते हैं कि इस काम से उनको जो सुकून मिलता है। वो आज तक किसी और काम में नहीं मिला। उनको लगातार 36 साल हो गए है ब्लड डोनेट करते हुए।
अरुण कौशल ने बताया कि उनके दाेनो बेटे तरुण कौशल और वरुण कौशल कई सालों से ब्लड डाेनेट कर रहे हैं। अभी तक तरुण ने आठ बार और वरुण ने 15 बार ब्लड डोनेट किया है। वो लागातर न्यूजीलैंड में भी पिछले चार साल से इस नॉबल कॉज को कर रहे हैं। वो वहां पर ब्लड डोनेशन कैंप लगाकर यह काम कर रहे हैं।
अरुण कौशल ने बताया कि उन्होंने सबसे पहले 6 जून 1978 में ब्लड डोनेट किया था। तब से अब तक वो लागातार 36 साल से ब्लड डोनेट कर रहे हैं। उनको ब्लड डोनेट करने की प्रेरणा 1990 में स्टेट बैंक आॅफ इंडिया के लगाए ब्लड डोनेशन कैंप से मिली। यहां पर उन्होंने हैंडिकैप्ड लोगों को ब्लड डोनेट करते हुए देखा। उनसे बात करने पर पता चला की वो लगातार ब्लड डोनेट करते आंए हैं। जब वो अपना एक अंग खोकर ब्लड डोनेट कर सकते हैं। उनका हौसला देखकर मुझे भी ब्लड डोनेट करने की प्रेरणा मिली। उसके बाद से मैने लागात ब्लड डाेनेट करना शुरू कर दिया। मैने तब से मन बना िलया कि मै हर साल कम से कम चार यूनिट ब्लड डोनेट करुगा मुझे खुशी है कि मैंने जो सोचा वो िकया। इसके साथ ही मुझे समय समय पर डॉक्टर जे जी जॉली और कांता स्वरूप प्रजीडेंट ब्लड बैंक सोसायटी चंडीगढ़ लगातार मोटीवेट करते रहे हैं। वो मुझे ही नहीं पूरे उत्तर भारत में नौजवानों को भी ब्लड डोनेट करने के लिए मोटीवेट करते रहे हैं।
अरुण कौशल को 1991 में पंजाब के पूर्व मुख्य मंत्री स्व. बेअंत सिंह ने सम्मनित किया। उसके बाद 1993 में उस सयम के क