मुंबई. महाराष्ट्र के कोंकण में रायगढ़ जिला धान की खेती के लिए जाना जाता हैं लेकिन इन दिनों यह इलाका पानी की तंगी से जूझ रहा है। बावजूद इसके यहां की महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी। फसल के पैटर्न में बदलाव कर मिलन राणे ने हल्दी की फसल लेनी शुरू की।
कम लागत में ज्यादा उत्पादन की राह उन्होंने अन्य महिलाओं को भी दिखाई। बस फिर क्या था। पूरा गांव उनसे जुड़ गया और टनों के हिसाब से उत्पादन होने लगा। मिलन की दिखाई राह ने गांव के करीब डेढ़ सौ से ज्यादा आदिवासी परिवारों को आर्थिक बदलाव की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। पेण तहसील के खारपले गांव की मिलन के पास खुद की जमीन भी नहीं थी। परिचित से 20 एकड़ जमीन किराए पर ली। वह भी दूसरे गांव में।
पहाड़ पार कर जाना पड़ता था। शुरुआत में 5 किलो बीज लगाया। उससे उन्हें 50 किलो हल्दी का उत्पादन लिया। सरकार की महालक्ष्मी सरस प्रदर्शनी में उन्हें बाजार की राह भी मिल गई। आज स्थिति यह है कि मिलन 5 हजार टन तक हल्दी का उत्पादन कर रही हैं। पिछले साल गांव वालों से 25 हजार टन हल्दी की फसल ली और उसका पाउडर बनाने की भी शुरूआत कर दी।
मार्गदर्शन लिया और दिया भी
बढ़ते कारोबार के साथ मिलन राणे 2007 में स्वयं सहायता समूह में शामिल हुईं। समूह की 11 सदस्य महिलाओं को हल्दी का उत्पादन लेने के लिए उन्होंने प्रेरित किया। फिलहाल 21 समूह की 150 महिलाएं हल्दी की खेती करती हैं। खारपले गांव से सटे आदिवासी इलाके में जाकर भी उन्होंने लोगों को प्रशिक्षित किया। आदिवासी गावों में अब 50 परिवार हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। उनसे हल्दी की खरीदी मिलन राणे ही करती हैं।