रोहतक में युवती के साथ दुराचार की घटना पर दिल्ली में कोई विरोध न होना अचंभित करता है। निर्भया प्रकरण के सबक इतनी जल्दी भुला दिए गए जबकि ‘आप’ सहित तीनों मुख्य दलों ने चुनाव में महिला सुरक्षा को प्रमुखता दी थी। 22 जनवरी को प्रधानमंत्री ने जिस हरियाणा से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ राष्ट्रीय मुहिम का आगाज किया था, नौ दिन बाद उसी सूबे में मानसिक तौर पर बीमार युवती से सामूहिक दुराचार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। यह नेपाली युवती, जिसका इलाज पीजीआई रोहतक में चल रहा था, 1 फरवरी को घर से लापता हो गई थी। 4 फरवरी को रोहतक-हिसार हाईवे पर उसका क्षत-विक्षत मिला।
दिल दहला देने वाला यह हादसा दिल्ली से महज 80 किमी दूर रोहतक का है पर इसके विरोध में दिल्ली कहां खड़ी है। 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया प्रकरण के खिलाफ आम लोगों का सड़कों पर जो गुस्सा फूटा था, उसने यह अहसास कराया था कि ऐसी हर घटना पर ऐसा ही रोष फूटेगा। पर आज वह प्रतिरोध भोंथरा क्यों हो गया है? क्या महानगरों के महिला संगठनों, सामाजिक संगठनों के नेत्री/नेता इस मुद्दे पर और अधिक ऊर्जा खर्च करना नहीं चाहते? न तो सड़कों पर आम जनता का गुस्सा फूटा और न ही प्रधानमंत्री या केंद्र के गृह मंत्री ने कोई बयान दिया।
कुछ का मानना है कि दिल्ली के विधानसभा चुनाव के कारण घटना की उपेक्षा हुई। चुनावी कोलाहल में तो दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा संबंधी मुद्दे पर लामबंदी भी हुई और भाजपा, कांग्रेस व ‘आप’ ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर वादों की झड़ी तक लगा दी थी। इस बिंदु पर सर्वे भी हुए और महिलाओं ने सरकारी महिला हेल्पलाइन ‘181’ पर भी सलाह मांगी। ‘आप’ जिसे सरकार बनाने के लिए प्रचंड जनादेश मिला है, महिला सुरक्षा उसकी पहली सात प्राथमिकताओं में शामिल है। उसके नेताओं का कुछ न बोलना सवाल खड़ा करता है। दरअसल, महिलाओं की हिफाजत संवेदनशील मुददा है और इसे राजनेताओं व समाज को अपने-अपने सूबे की हदबंदी से ऊपर उठकर देखने वाली सोच विकसित करनी होगी। महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा, अपराध को लेकर सरकारें जब तक शून्य सहनशीलता की नीति नहीं अपनाती हैं, तब तक हालात नहीं बदलने वाले।
हर 22वें मिनट में एक महिला से दुराचार होता है। सजा की दर बहुत ही कम है। दुराचार का हर मामला फास्ट ट्रैक अदालत में नहीं जाता। इस मांग को पूरा करने की सरकार की नीयत नहीं है। सवाल उठता है कि एक हजार करोड़ की रकम वाले निर्भया फंड का क्या हुआ? महिलाओं की सुरक्षा के वादे पर वोट मांगने वाले और इस वादे से राजनीतिक दूरी बनाए रखने वाले यानी सभी राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर आत्म-मंथन करना होगा कि आखिर किन उपायों, नीतियों, कार्यक्रमों के जरिये महिलाओं को अधिक से अधिक सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जाए। प्रधानमंत्री मोदी का ‘बेटी बचाओ’ व ‘मेक इन इंडिया’ अभियान जमीनी स्तर पर सफल बनाने के लिए स्त्री सुरक्षा पर निवेश भी करना होगा। दरकार हुंकार भरने की नहीं बल्कि ठोस कदम उठाने की है।
लेखिका दिल्ली स्थित पत्रकार हैं।
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