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महाराष्ट्र :गठबंधन में सीट की जंग, जानें किस पार्टी को क्या हासिल होगा इस लड़ाई से?

7 वर्ष पहले
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(फाइल फोटो: शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात करते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह।)
नई दिल्ली/मुंबई. महाराष्ट्र में सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राकांपा गठबंधन पर संकट बना हुआ है। चारों पार्टियां महाराष्ट्र में सत्ता पाने के लिए सीटों के जोड़-तोड़ में लगी हुई हैं। सीटों की खींचतान में किस पार्टी को क्या हासिल होगा, इस बात पर दैनिक भास्कर का एक्सपर्ट पैनल कुछ महत्वपूर्ण बिंदु आपके सामने लाया है। जानिए, गठबंधन में विवाद की वजह -
1. झगड़ा क्यों? क्योंकि चारों को चाहिए अपना सीएम
शिवसेना : कुल 288 में से अपने लिए 151, जबकि भाजपा के लिए 119 सीटें चाहती है। बाकी सीटें अन्य सहयोगियों के लिए। यही फॉर्मूला 25 साल से चल रहा है। इस विवाद को तूल देने के पीछे शिवसेना की मंशा है कि सीएम पद के लिए एनडीए उद्धव ठाकरे को प्रोजेक्ट करे।
भाजपा : हर हाल में महाराष्ट्र में अपना सीएम चाहती है। उद्धव को सीएम प्रोजेक्ट करने के बजाय उसने फॉर्मूला दिया है कि जिसे ज्यादा सीटें, सीएम उसी का। इसीलिए वह 130 सीटें मांग रही है। भाजपा अब महाराष्ट्र में केंद्र की तरह खुद को बड़े भाई की भूमिका में देख रही है।
कांग्रेस : कमजोर होती मोदी लहर और एनडीए के झगड़े से कांग्रेस की उम्मीदें बढ़ी हैं। लिहाजा, 15 साल पुराने सहयोगी एनसीपी को कम सीटें देकर अवसर अपने अनुकूल बनाने में जुटी है।
एनसीपी : 50 फीसदी यानी 144 सीटें चाहती है। पार्टी प्रमुख शरद पवार का गणित है कि ज्यादा सीटें जीतकर बेटी सुप्रिया सुले को सीएम बनवाया जाए।

2. मुश्किलें क्या? अकेले लड़ने से चारों ही बचना चाहेंगे
शिवसेना : वोट बैंक सिर्फ मराठी हैं। अकेले लड़ी तो ये वोट बैंक भाजपा-एनसीपी-मनसे और शिवसेना के बीच बंट जाएगा। उसका कैडर भी बिखरकर मनसे में जा चुका है। बाल ठाकरे की तरह कोई करिश्माई नेता भी नहीं है। पूरा ड्रामा केवल प्रेशर पॉलिटिक्स है।

भाजपा : बेशक पार्टी का वजूद महाराष्ट्र में बड़ा हुआ है, लेकिन अब भी शिवसेना के बिना वह कमजोर है। अकेले लड़ी तो भले ही वह शिवसेना से ज्यादा सीटें जीत ले, लेकिन सरकार बनाने लायक बहुमत उसे नहीं मिल सकता। ऐसे में, उसकी कोशिश गठबंधन बचाए रखने की होगी।
कांग्रेस : अगर एनसीपी से गठबंधन टूटता है तो कांग्रेस अकेली हो जाएगी, क्योंकि न तो वह शिवसेना के साथ जा सकती है और न भाजपा के साथ। 15 साल की एंटी इन्कमबेंसी के चलते अकेले दम पर बहुमत मिलना मुश्किल है। वह नहीं चाहेगी कि एनसीपी का साथ छूटे।
एनसीपी : अकेले दम पर बहुमत तो नहीं ला सकती, लेकिन पवार जानते हैं कि कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि गठबंधन टूटे। लिहाजा, अपनी शर्तें मनवाने के लिए दबाव बनाए रखेंगे।
3. तलाक हुआ तो, भाजपा-एनसीपी फायदे में

भाजपा : पार्टी को लगता है कि अकेले लड़ने पर कम से कम 100 सीटें तो उसे मिल ही जाएंगी। वहीं, शिवसेना पूरी ताकत भी लगा दे तो उसे 50-60 सीटें ही मिल पाएंगी। यानी चुनाव बाद जुगाड़ करना होगा। ऐसे में, भाजपा केंद्र में सत्ता होने का फायदा उठा सकती है। एनसीपी-मनसे को साथ लेकर सरकार बना सकती है।

एनसीपी : यूपीए टूटा तो सबसे बड़ा फायदा शरद पवार की पार्टी को होगा। कांग्रेस से साथ छूटा तो भाजपा से हाथ मिला सकती है। भाजपा हाथ न मिलाए तो मनसे तैयार है। और मनसे साथ न आए तो भाजपा को जवाब देने के लिए शिवसेना साथ आने को तैयार है, क्योंकि शरद पवार के बाल ठाकरे से बेहद अच्छे रिश्ते रहे थे। यानी चुनाव में किसी को बहुमत न मिले और बाद में सहयोगियों की जरूरत पड़े तो सौदेबाजी के लिहाज से सबसे बड़े फायदे में एनसीपी ही होगी।
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