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जजों के कथित भ्रष्टाचार मामले में हाईकोर्ट का सुनवाई से इनकार

6 वर्ष पहले
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मुंबई. हाईकोर्ट ने न्यायाधीशों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मामले पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया है कि यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता चाहे तो इस मामले में सुप्रीमकोर्ट में जा सकते हैं। सोमवार को न्यायमूर्ति अभय ओक और न्यायमूर्ति अनिल कुमार मेनन की खंडपीठ ने कहा कि वे अपने सहकर्मी न्यायाधीशों के खिलाफ किसी तरह के आदेश नहीं दे सकते। यह उनके न्याय क्षेत्र से बाहर है।
मामले में केतन तिरोडकर ने जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में तिरोडकर ने आरोप लगाया था कि बॉम्बे हाईकोर्ट के कुछ न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। याचिका में उन्होंने इस मामले में जांच की मांग की थी। इसके लिए तिरोडकर ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का सहारा लिया था। लेकिन उसी आदेश के आधार पर खंडपीठ ने कहा कि यह अधिकार सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को है कि वे बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की जांच के मामले में कोई आदेश दें। तिरोडकर का कहना है कि वे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।
संपादक शिरीन को राहत
अवधनामा की संपादक शिरीन दलवी को बॉम्बे हाईकोर्ट ने दो दिन की अंतरिम राहत दी है। दलवी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि उनके खिलाफ दायर सभी मामले एक ही पुलिस थाने में दर्ज कराए जाएं। उर्दू अखबार अवधनामा ने फ्रांसीसी पत्रिका चार्ली हेब्दो में छपी पैगम्बर मोहम्मद की तस्वीर फिर से प्रकाशित की गई थी। सोमवार को न्यायमूर्ति आरवी मोरे और न्यायमूर्ति अनुजा प्रभुदेसाई की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। दलवी के वकील मिहिर देसाई ने दलील दी कि एक ही आरोप में उनके मुवक्किल के खिलाफ राज्य के छह पुलिस स्टेशनों में एफआईआर दर्ज की गई है।

मुंब्रा में दर्ज एफआईआर के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। इसी तरह मुंबई में दर्ज एक मामले में उन्हें अग्रिम जमानत मिली है। लेकिन अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में रोजाना दलवी के खिलाफ मामले दर्ज हो रहे हैं ऐसे में उन्हें बेहद परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। देसाई ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के लिए हर मामले में जमानत के लिए अदालत के चक्कर लगाना मुश्किल हो रहा है इसलिए सभी मामलों को एक ही पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित कर जांच की जाए। देसाई ने अदालत को बताया कि सभी मामलों में दलवी के खिलाफ आईपीसी की धारा 285ए के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। देसाई ने अदालत को बताया कि विवाद के बाद अखबार का प्रकाशन बंद हो चुका है। दलवी और उनके परिवार को घर छोडऩे पर मजबूर होना पड़ा है। साथ ही डर की वजह से उनके बच्चे भी कॉलेज नहीं जा पा रहे हैं।
वहीं सरकार का पक्ष रखते हुए वकील एस शिंदे ने अदालत को बताया कि दलवी के खिलाफ पांच एफआईआर दर्ज हुई हैं। इनमें से मुंबई और ठाणे के पुलिस स्टेशनों में दो-दो एफआईआर हैं जबकि एक एफआईआर मालेगांव के पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई है। साथ ही शिंदे ने कहा कि फ्रांस की पत्रिका में पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून छपने के बाद किस तरह का हंगामा हुआ था , यह दलवी भी जानतीं थीं। इसके बावजूद उन्होंने कार्टून फिर से प्रकाशित कर मुस्लिम समाज की भावनाएं आहत कीं। दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद खंडपीठ ने बुधवार को मामले की होने वाली अगली सुनवाई तक दलवी को अंतरिम राहत दे दी है। यानी पुलिस अगली सुनवाई के पहले इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर सकती।