मुंबई. राज्य में हुए सिंचाई घोटाले की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के माध्यम से कराए जाने कि सिफारिश गृह विभाग ने मुख्य सचिव से की है। अब गेद मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के पाले में है। ऐन विधानसभा चुनाव के मौके पर यदि मुख्यमंत्री ने इस जांच को हरीझंडी दी तो उपमुख्यमंत्री अजित पवार और प्रदेश राकांपा अध्यक्ष सुनील तटकरे की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दोनों पर घाेटाले में लिप्त हाेने के आराेप हैं। सूत्रों के मुताबिक इस मामले में अंतिम अनुमति देने का अधिकार मुख्यमंत्री के पास है। अब चव्हाण जांच की अनुमति से जुड़े प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हैं अथवा नहीं इस पर सभी कि निगाहे टिकी हुई हैं। गौरतलब है कि पवार व तटकरे दोनों सिंचाई विभाग के मंत्री रह चुके हैं।
क्या है मामला
राज्य में अलग-अलग सिंचाई परियोजनाओं के जरिए 70 हजार करोड़ रुपए के घोटाले की बात सामने आई थी। सिंचाई घोटाले से जुड़े आरोपों की पड़ताल करने के लिए सरकार ने चितले कमेटी गठित की थी। कमेटी ने इस घोटाले में किसी राजनेता को दोषी नहीं ठहराया था, लेकिन सिंचाई परियोजनाओं में अनियमितता होने कि बात कही थी। अब गृह मंत्रालय ने इस मामले की जांच एसीबी से कराए जाने की सिफारिश की है।
चव्हाण का चुनावी दांव!
समझा जा रहा है कि सीट बंटवारे को लेकर राकांपा पर नकेल कसने के लिए मुख्यमंत्री ने यह दांव चला है। सूत्रों के मुताबिक यदि राष्ट्रवादी कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय करती है तो उस वक्त मुख्यमंत्री अपने इस हथियार का इस्तेमाल कर सकते हैं।
एसीबी ने गृह विभाग से मांगी थी अनुमति : सामाजिक कार्यकर्ता प्रवीण वाटेगांवकर ने कुछ महीने पहले एसीबी से इस मामले की शिकायत की थी। वाटेगांवकर ने तत्कालीन सिंचाई मंत्री अजित पवार, सुनील तटकरे व सिंचाई विभाग के कुछ अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इसके बाद एसीबी के महानिदेशक प्रवीण दीक्षित ने इस मामले में गृह विभाग को पत्र भेजकर अजित व तटकरे के खिलाफ जांच की अनुमति मांगी थी। विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद गृह विभाग ने एसीबी की मांग को मानते हुए इससे संबंधित फाइल मुख्य सचिव स्वाधीन क्षत्रिय के पास भेज दी थी ।