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आरक्षण पर कोर्ट बोली: मराठा जैसा पिछड़ापन सभी जातियों में

7 वर्ष पहले
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मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि मराठा जाति को लेकर जिस पिछड़ेपन की बातें सरकार कह रही है ये सभी जातियों में दिखाई देती है। हाईकोर्ट ने मंगलवार को यह बात मराठा व मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कही। सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता डेरिस खंबाटा ने कहा कि 1932 से राज्य में जाति के आधार पर सर्वेक्षण नहीं हुआ था। राणे कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण का निर्णय लिया गया है।
महाधिवक्ता की दलील
खंबाटा ने कहा कि मराठा समाज के लोग भले ही सत्ता में रहे हों पर सिर्फ 16.87 प्रतिशत लोग सरकारी नौकरी में हैं। काफी संख्या में लोग सामाजिक स्तर पर पिछड़े हैं। 29 प्रतिशत लोग वित्तीय रूप से पिछड़े हैं। 27 प्रतिशत लोग शैक्षणिक रूप से पिछड़े हंै। समाज की 58 प्रतिशत महिलाएं अशिक्षित हैं। 90 प्रतिशत लोगों की आय एक लाख से कम है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि ऐसा पिछड़ापन सभी जातियों में दिखाई देता है। जहां तक प्रश्न सरकारी नौकरी का है तो क्या जब मराठा समाज के लोग नौकरी के लिए आवेदन करते हैं तो उनके साथ भेदभाव होता है? इसका राज्य के महाधिवक्ता कोई प्रभावी उत्तर नहीं दे सकें।

मुख्यधारा में लाने दिया आरक्षण
उन्होंने कहा कि आरक्षण का इस्तेमाल मराठा समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए किया गया है। जहां तक प्रश्न आरक्षण के 50 प्रतिशत से अधिक न होने का है तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसे बढ़ाने की छूट दी है। बशर्ते इसके लिए न्याय संगत व युक्तिसंगत स्पष्टीकरण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को दिए गए पांच प्रतिशत आरक्षण में उन लोगों को लाभ नहीं मिलेगा जो पहले से आरक्षित वर्ग में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ने नियमों में रहते हुए मराठा समाज को आरक्षण देने का निर्णय लिया है। इस मामले पर गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।