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डाउनलोड करेंमुंबई। 7 फरवरी को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए राकांपा ने दोनों उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है। विधानसभा में राकांपा की संख्याबल को देखते हुए उसके दूसरे उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। हालांकि कांग्रेस के अतिरिक्त मतों और निर्दलियों के भरोसे राकांपा की दूसरी सीट पर भी जीत निश्चित मानी जा रही है।
किसके कितने सदस्य
महाराष्ट्र से राज्यसभा के सात सदस्यों का कार्यकाल आगामी 2 अप्रैल को समाप्त हो रहा है। 288 सदस्यों की विधानसभा में फिलहाल कांग्रेस के 82, राष्ट्रवादी कांग्रेस के 62, भाजपा के 46, शिवसेना के 45, मनसे से 13 व निर्दलीय के 24 सदस्य हैं।
9 वोट की जरूरत
राकांपा ने अपने दोनों उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। राकांपा अध्यक्ष शरद पवार के अलावा पार्टी उपाध्यक्ष वरिष्ठ वकील माजिद मेमन को राज्यसभा के लिए उम्मीदवारी निश्चित की गई है। इस चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार की विजय का कोटा 37 का है। जबकि विधानसभा में राकांपा के 62 सदस्य हैं व 3 निर्दलीय उनके साथ हैं। इस हिसाब से राकांपा को अपने दूसरे उम्मीदवार की जीत के लिए 9 अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करना पड़ेगा। जबकि कांग्रेस के पास अपने दोनों सदस्यों की जीत के लिए पर्याप्त वोटों से अधिक वोट हैं। कांग्रेस के पास 8 अतिरिक्त वोट हैं। 24 निर्दलीय विधायक भी हैं। इसलिए राकांपा के लिए अतिरिक्त वोट का इंतजाम करना मुश्किल नहीं होगा।
राज्यसभा उम्मीदवारी को लेकर कांग्रेस में नाराजगी
आम लोगों की बात छोड़ भी दे तो अब कांग्रेस नेताओं को भी अपने पार्टी नेताओं की करनी-कथनी में अंतर नजर आने लगा है। राकांपा ने जहां अपने दोनों राज्यसभा सदस्यों को बदल दिया हैं, वहीं कांग्रेस ने अपने दोनों मौजूदा राज्यसभा सदस्यों मुरली देवड़ा और हुसैन दलवाई को फिर से राज्यसभा में भेजने का फैसला किया है। दबी जुबान में पार्टी के भीतर इस बात की आलोचना हो रही है। क्योंकि देवड़ा अब उम्रदराज हो चुके हैं। जिसकी वजह से उनकी सक्रियता न के बराबर है जबकि दलवाई को राज्यसभा में भेजने से पार्टी को कोई लाभ नहीं हुआ।
अपने अब तक के कार्यकाल में वे कोई छाप नहीं छोड़ पाए। पिछले दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने युवाओं को आगे लाने की बात कही थी। प्रदेश कांग्रेस के एक पदाधिकारी कहते हैं कि जिस तरह राज्यसभा के लिए पार्टी बुजुर्ग नेताओं को ही तरजीह दे रही है, उससे तो यहीं लगता है कि युवाओं को आगे लाने की बात सिर्फ राहुल गांधी के भाषणों तक सीमित है।
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