मुंबई। लोकसभा चुनाव परिणाम ने मुंबई से सटे जिले ठाणे की राजनीति को भी प्रभावित किया है। 2009 के विधानसभा चुनाव में जिले पर शिवसेना और राकांपा का लगभग बराबर वर्चस्व था, लेकिन चार महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में देश के इस सबसे बड़े जिले (विभाजन से पहले) से कांग्रेस-राकांपा का सफाया हो गया। लोकसभा की चारों सीटों पर भाजपा-शिवसेना युति ने कब्जा जमा लिया। जिले की सिर्फ तीन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को बढ़त मिली। ठाणे (पालघर को मिलाकर ) जिले की 24 विधानसभा सीटों में से सिर्फ एक सीट पालघर पर कांग्रेस का कब्जा है।
पालघर से राज्य के आदिवासी विकास राज्यमंत्री राजेंद्र गावित विधायक हैं। जिला विभाजन के बाद यह सीट भी पालघर जिले में चली गई है। ऐसे में ठाणे जिले में कांग्रेस का खाता खुलेगा अथवा नहीं इसे लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। 1 अगस्त 2014 को ठाणे जिले का विभाजन कर पालघर नाम से नया जिला बनाया गया। कांग्रेस को उम्मीद है कि इस फैसले का राजनीतिक लाभ उसे विस चुनाव में मिलेगा, क्योंकि जिला विभाजन की मांग काफी दिनों से हो रही थी। अब ठाणे जिले में विधानसभा की 18 सीटें बची हैं जबकि नवगठित जिले पालघर में विस की 6 सीटें हैं। ठाणे जिले की 18 विधानसभा सीटों में से शिवसेना के 6, राकांपा के पास 5, भाजपा के पास 3, मनसे के पास 2 व समाजवादी पार्टी के पास एक सीट है। जिले से हितेंद्र ठाकुर के नेतृत्व वाले बहुजन विकास आघाड़ी के 2 विधायक हैं।
लोकसभा चुनाव ने बदला गणित
विधायकों की संख्या के लिहाज से इस जिले में शिवसेना-भाजपा युति और कांग्रेस-राकांपा आघाड़ी का पलड़ा लगभग बराबर है, लेकिन लोकसभा चुनाव परिणामों को विधानसभावार देखें तो आघाड़ी का सफाया हो चुका है। ठाणे-पालघर जिले की चार लोकसभा सीटों में से भिवंडी की दो और कल्याण लोकसभा क्षेत्र की एक विधानसभा सीट पर कांग्रेस-राकांपा को बढ़त मिली थी। बाकी सभी सीटों पर शिवसेना-भाजपा के उम्मीदवार आगे थे।
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