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आधी आबादी तरस रही न्याय को, 33% आरक्षण की वकालत, 6% टिकट भी नहीं

7 वर्ष पहले
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नागपुर. राजनीतिक, सामाजिक व आम मंचों से महिला सक्षमीकरण के नारे खूब बुलंद होते है। राजनीतिक नेता आधी आबादी को संसद-विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की वकालत भी करते है। बाकायदा जनता को संदेश देने और जोडऩे के लिए प्रत्येक पार्टियों ने अपनी-अपनी महिला आघाडी भी बना रखी है। पर बात जब उसे अमल करने की आती है तो क्या नेता और पार्टी, सभी अपनी डफली-अपना राग आलापते है। यह कहकर महिलाओं को टिकट देने से इनकार किया जाता है कि वे जीतने में सक्षम नहीं है या फिर सामाजिक-जातिय समीकरणों में फिट नहीं बैठ रही है।
पिछले तीन विधानसभा चुनाव इसके साक्षी है। 33 प्रतिशत आरक्षण कोटा का समर्थन करने वाली सभी पार्टियां अपनी महिला नेत्रियों को 6 प्रतिशत टिकट भी नहीं दे पायी है। इसमें भी जीतने वाली महिला उम्मीदवारों की संख्या कम ही नहीं रही है। 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में पिछले तीन चुनाव से 12 से अधिक महिलाएं नहीं पहुंच पायी है। प्रगतिशील विचारों वाले महाराष्ट्र राज्य में महिलाओं पर इससे अधिक अन्याय क्या हो सकता है? ऐसे में इस विधानसभा चुनाव राजनीतिक पार्टियों से न्याय की उम्मीद की जा रही है। अपेक्षा है कि अपनी सूची में महिलाओं को प्राथमिकता और प्रतिनिधित्व देंगे।

वर्ष 2009 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कुल 3559 उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आजमायी थी। इसमें 3348 पुरुष और 211 महिला उम्मीदवार थे। इसमें भी कांग्रेस-राकांपा, भाजपा-शिवसेना ने सिर्फ 35 महिला उम्मीदवार को टिकट दिए थे। 35 में सिर्फ 11 महिला उम्मीदवार जीतकर आयी। इससे पहले वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव में 2678 उम्मीदवार पूरे राज्य से खड़े थे। इसमें 2521 पुरुष और 157 महिला उम्मीदवार थी। कांग्रेस-राकांपा, भाजपा-शिवसेना नें 26 टिकट महिलाओं को दी थी। 26 में से 12 महिलाएं विजेता बनी थी। वर्ष 199 में कुल 2006 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। इसमें 1920 पुरुष और 86 महिला उम्मीदवार थी।
कांग्रेस-राकांपा, भाजपा-सेना ने 25 महिलाओं को मैदान में उतारा था। 25 में से 12 महिला विजयी झंडा लहराया था। हालांकि पहले की तुलना में महिलाएं अधिक सक्षम हुई है। पार्टियों में खासा दबदबा बढ़ा है। राजनीतिक निर्णयों में भागीदारी बढ़ी है। विशेष यह कि ज्यादातर विधानसभा सीटों पर महिलाओं ने दावा किया है। माना जा रहा है कि इस बार महिलाओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। हालांकि यह समय बतायेगा कि पार्टियां इसे कितनी गंभीरता से लेते है।
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