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साथ तो आना ही है, कांग्रेस-राकांपा में गठजोड़ की कवायद जारी

7 वर्ष पहले
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(फोटो- मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण)
नागपुर. राज्य में सत्ताधारी आघाड़ी में गठजोड़ की कवायद जारी है। कांग्रेस व राकांपा बार बार कह रहे हैं कि दोनों मिलकर चुनाव लड़ेंगे, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर बात नहीं बन पा रही है। इस बीच मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि अगला मुख्यमंत्री कांग्रेस का ही होगा। उपमुख्यमंत्री अजित पवार इस बयान पर अड़े हैं कि मुख्यमंत्री पद चुनाव बाद तय होगा।
दोनों दलों ने सभी सीटों के लिए उम्मीदवार तैयार रखने का होमवर्क भी पूरा कर लिया है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आघाड़ी कायम रहेगी या नहीं, लेकिन राज्य की राजनीति के जानकारों की माने तो दोनों दलों को साथ आना ही होगा। पिछली बार की तरह इस बार भी उम्मीदवार अर्जी भरने के अंतिम दिन तक सीटों का बंटवारा हो सकता है।
अलग-अलग बढऩा मुश्किल
यह भी कहा जा रहा है कि दोनों साथ नहीं आएंगे, तो सत्ता से दूर चले जाएंगे। परंपरा ध्यान में रखें तो कांग्रेस का दोनों प्रवाह अलग-अलग नहीं बढ़ पाएगा। राकांपा व कांग्रेस तीसरी बार साथ-साथ चुनाव लडऩे जा रहे हैं। इस तरह साथ-साथ चुनाव लडऩे का चालीस वर्ष पुराना इतिहास है। राज्य में कांग्रेस-राकांपा के रणनीतिक दावपेंच 1969 से 1972 के काल का स्मरण कराता है।
आपातकाल के बाद केंद्र में इंदिरा गांधी की सत्ता गई और इंदिरा कांग्रेस तथा राष्ट्रीय कांग्रेस बनी। दोनों कांग्रेस में तब जमकर जोरआजमाइश चल रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में 1978 में विधानसभा चुनाव हुआ। यशवंतराव चव्हाण, वसंतदादा पाटील समेत अन्य बड़े नेता मूल कांग्रेस में रहे। प्रभा राव, नाशिकराव तिरपुड़े जैसे नेता इंदिरा गांधी के साथ थे। यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रही थी।
कांग्रेस की प्रतिष्ठा व ताकत यशवंतराव चव्हाण के साथ थी। चव्हाण के नेतृत्व में कांग्रेस ने 259 सीटों पर चुनाव लड़ा। गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस 203 सीटों पर ही लड़ पाई। दोनों कांग्रेस ने शेष सीटों पर रिपाइ को लडऩे दिया। अनेक स्थानों पर शिवसेना के उम्मीदवार इंदिरा कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में थे। इंदिरा कांग्रेस के साथ शिवसेना को गहरी मात मिली।
कई सीटों पर शिवसेना उम्मीदवार जमानत नहीं बचा पाए। एक भी शिवसैनिक विधायक नहीं बन पाया। सबसे अधिक सीटें लडऩे वाली चव्हाण कांग्रेस के 69 विधायक बने। इंदिरा कांग्रेस के विधायकों की संख्या 62 थी। चव्हाण कांग्रेस को 25 प्रतिशत और इंदिरा कांग्रेस को 18 प्रतिशत मत मिले थे। चुनाव के बाद दोनों कांग्रेस साथ आई। उनकी सरकार ज्यादा दिन टिक नहीं पाई। कांग्रेस में गुटबाजी उभरी। समाजवादी कांग्रेस भी बनी। 1986 में समाजवादी कांग्रेस का विलय कर सभी कांग्रेस गुट साथ आ गए। कांग्रेस के विधायकों की संख्या उस समय 225 थी।
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