नागपुर. बड़े राजनीतिक दलों में उम्मीदवारी के लिए 'एक अनार सौ बीमार' की स्थिति बनी हुई है। जिनका कभी पार्टी में बोलबाला था, अब वे ही टिकट के लिए इसके-उसके चक्कर काट रहे हैं। नए को सब्र व पुराने को नव परिवर्तन का पाठ पढ़ाया जा रहा है। ऐसे में बड़े दलों के बीच गठबंधन व सीट भागीदारी नहीं हो पाना बड़ा प्रश्न है। गठबंधन के बजाय दलों में अपने दम पर चुनाव लडऩे के सुर उठने लगे हैं। साथ ही ऐसे नेता भी सामने आने लगे हैं, जो अपने दम पर अर्थात निर्दलीय चुनाव लडऩे की तैयारी करने लगे हैं। छोटे या किसी समुदाय विशेष की राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले दलों के टिकट भी नकारे जाने लगे हैं। छोटे दलों से यह कहते हुए मोहभंग हो रहा है कि किसी की मुहर लगाकर अपना दायरा बांध लेने से अच्छा है, निर्दलीय रहकर सबके साथ होना।
प्रचार में कमी नहीं
लगभग हर क्षेत्र में ऐसे इच्छुक उम्मीदवार हैं, जो पार्टी से टिकट तो मांग रहे हैं, लेकिन उम्मीदवार के तौर पर प्रचार भी कर रहे हैं। प्रचार में जुटे इन नेताओं का कहना है कि निशान चाहे जो हो, पर एक बार मैदान में आ ही गए हैं तो पीछे नहीं हटेंगे। पश्चिम नागपुर से संभावित निर्दलीय उम्मीदवार ने करीब दो माह से जनसंपर्क जारी रखा है। विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। दक्षिण में शिवसेना व भाजपा के बागी उम्मीदवार निर्दलीय भूमिका में सामने की आने की तैयारी में हैं। पूर्व नागपुर में भी यही स्थिति है।
सबसे अधिक हलचल मध्य में
राकांपा व कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने की स्थिति में भी मैदानन में डटे रहने का दावा कर रहे नेता प्रचार में जुट गए हैं। सबसे अधिक हलचल मध्य नागपुर में है। यहां भाजपा व कांग्रेस की उम्मीदवारी पाने के लिए कार्यकर्ताओं में होड़ सी है। सबके अपने-अपने मत गणित हैं। उत्तर में आंबेडकरवादी संगठनों के नाम पर दर्जन भर निर्दलीय उम्मीदवार सामने आने के साफ संकेत हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष मददगार बनने की भूमिका में रहेंगे।
रहते हैं सत्ता में
कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि निर्दलीय का महत्व पार्टी विधायक से कहीं अधिक हो जाता है। सत्ता में रहते हैं। 1995 में जिले में 5 निर्दलीय विधायक चुने गए थे। उनमें से सावनेर के सुनील केदार व काटोल के विधायक अनिल देशमुख को युति सरकार में मंत्री पद मिला था। कामठी से देवराव रडके, रामटेक से अशोक गुजर व कलमेश्वर से रमेश बंग निर्दलीय जीते थे।