नागपुर. 1960 में संयुक्त महाराष्ट्र का संशोधन हुआ। नए महाराष्ट्र का गठन हुआ। महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में विदर्भ राज्य की मांग का मुद्दा लगभग बार उठता रहा है। कई बार इस मुद्दे को लेकर राजनीति गर्माती है, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा है। इस बार भी विदर्भ की मांग का मुद्दा चुनाव में छाया रहेगा। दिल्ली में धरना-प्रदर्शन किया गया है, लेकिन विदर्भ को लेकर चुनावी गठबंधन के आसार कम ही नजर आ रहे हैं। शिवसेना विदर्भ विरोध पर कायम है। कांग्रेस व राकांपा के सुर भी बदल गए हैं।
भाजपा कुछ भी खुलकर बोलने की स्थिति में नहीं है। बसपा व अन्य छोटे दलों ने विदर्भ का राग छेड़ा है। विदर्भ आंदोलन का रणनीतिक केंद्रबिंदु देखा जाए तो केंद्र की सत्ता में अधिक समय तक रहने वाली कांगे्रस का विरोध अधिक प्रखर होता रहा है। विदर्भ विरोधियों के रूप में कांग्रेस व शिवसेना की भूमिका नागनाथ व सांपनाथ के रूप में प्रचारित की जाती रही है। राज्य के सवाल पर आज भले ही विदर्भ कांग्रेस से खफा है, लेकिन पहले विदर्भ ने ही कांग्रेस को अधिक साथ दिया। पश्चिम महाराष्ट्र में कांग्रेस की भद पिटती रही। मराठवाड़ा व विदर्भ में उसे ऊर्जा मिलती रही।
भाषायी राज्य गठन को लेकर तीव्र प्रदर्शन
राजनीतिक जानकारों के अनुसार संयुक्त महाराष्ट्र में 1952 से 1957 के दौरान कांग्रेस की भूमिका मराठी राजनीतिज्ञों के लिए तल्ख भरी थी। इस दौरान मोरारजी देसाई मुंबई राज्य के मुख्यमंत्री थे। मुंबई को महाराष्ट्र को देने से दिल्ली का एतराज था। राज्य पुनर्रचना की सभी समितियों ने संयुक्त महाराष्ट्र की स्थापना का विरोध किया था। मोरारजी देसाई व एसके पाटील ने 1955 में मुंबई को महाराष्ट्र को देने का विरोध किया था। लिहाजा संयुक्त महाराष्ट्र का आंदोलन तीव्र हुआ था। 6 फरवरी 1956 को केशवराव जेधे की अध्यक्षता में पुणे में संयुक्त महाराष्ट्र की आंदोलन सभा हुई थी।
1957 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस विरोधी माहौल बनाते हुए 11 संगठन एकीकृत हुए थे। अब तक राज्य पुनर्गठन प्रक्रिया के तहत मध्यप्रदेश के विदर्भ व हैदराबाद रियासत के मराठवाड़ा क्षेत्र को महाराष्ट्र अर्थात तत्कालीन मुंबई राज्य से जोड़ दिया गया था। गुजरात का कच्छ व सौराष्ट्र भी मुंबई राज्य से जुड़ा था। मुंबई को महाराष्ट्र को देने का विरोध दिल्ली से जारी था। राजनेताओं के अलावा कई जाने-माने उद्यमी विरोध में शामिल थे। भाषायी राज्य गठन को लेकर तीव्र प्रदर्शन हुए थे। 1957 का चुनाव रोचक हो गया था। प्रबोधनकार ठाकरे, सेनापति बापट, एसएम जोशी, श्रीपात अमृत डांगे समेत अन्य नेता कांग्रेस के विरोध में आक्रामक भूमिका में थे।
कांग्रेस को पश्चिम महाराष्ट्र में मिली थी हार
चुनाव मैदान में 8 दल प्रमुखता से उतरे थे। उनमें 4 राष्ट्रीय व 4 क्षेत्रीय दल शामिल थे। एक ओर कांग्रेस, तो दूसरी ओर सारे दल थे। राज्य के मुद्दे पर मतदान भी अधिक हुआ था। कांग्रेस ने 396 में से 234 सीटें जीती। विरोध के बाद भी कांग्रेस को विदर्भ, कच्छ, सौराष्ट्र, मराठवाड़ा का साथ मिला। केवल पश्चिम महाराष्ट्र में हार मिली।
विदर्भ कांग्रेस के साथ
प्रजा समाजवादी पार्टी को 98 में से 36 सीटों पर जीत मिली थी। शेतकरी कामगार पक्ष ने 55 में से 31 सीटें जीती। शेडयूल कास्ट फेडरेशन ने 13 सीटें जीती। संयुक्त महाराष्ट्र समिति केवल पश्चिम महाराष्ट्र में ही सीटें जीत पायी। कांग्रेस को पश्चिम महाराष्ट्र में 135 में से 33 सीटों पर ही जीत मिली। विदर्भ में 63 में से 55 व मराठवाड़ा में 40 में से 33 सीटें जीतने में वह सफल रही। राज्य पुर्नगठन के मामले में विदर्भ व मराठवाड़ा दिल्ली व कांग्रेस के साथ रहा। आपातकाल में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस संकट में फंस गई। उस समय भी विदर्भ में कांग्रेस के उम्मीदवार जीते। अब दिल्ली में कांग्रेस की जगह भाजपा है। विरोध व समर्थन की रणनीति क्या मोड़ लेती है यह चुनाव परिणाम बताएगा।
(मोरारजी देसाई- फाइल फोटो)