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किला जीतने के बाद हुई थी मराठा सरदार की मौत, तिलक से यहीं मिले थे नेताजी और गांधीजी

3 वर्ष पहले
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पुणे. मौसम के बरसात में पुणे के सिंहगढ़ किले का नजारा कुछ अलग ही होता है। इस किले पर लाखों टूरिस्ट कोहरा और बरसात का लुत्फ उठाने के लिए पहुंचते हैं। साल भर यहां टूरिस्ट की भीड़ रहती है। इस किले को 'कोंढाणा' नाम से जाना जाता था। शिवाजी महाराज के सरदार  तानाजी मालुसरे ने अपने बेटे की शादी छोड़ लड़ाई लड़ी थी। इसमें उसका निधन होने के बाद शिवाजी ने उन्हें शेर कहा था, और किले को भी सिंहगढ़ नाम दिया था। महापुरुषों के पदस्पर्श से पावन हुआ सिंहगढ़.....
 
 
-कोंढाणा के किले पर शिवाजी महाराज से पहले भी कई राजाओं ने राज किया था। शिवाजी महाराज के समय यह किला उनके कब्जे में था।
-जब यह किला आदिलशाह के पास था दादोजी कोंडदेव इस किले के सुभेदार थे। यहीं पर आदिलशाह ने लश्कर केंद्र बनाया था।
-बाद में शिवाजी ने इसे अपने कब्जे में लिया। सन 1649 में शिवाजी महाराज ने आदिलशाह से अपने पिता को छुड़ाने के बदले में यह किला उन्हें वापस कर दिया। 
 

इसलिए किले को मिला 'सिंहगढ़' नाम 

-शिवाजी महाराज ने जून 1665 में मुगलों से किए गए करार के तहत कोंढाणा समेत 22 किले उन्हें लौटाए थे। 
-इस करार से शिवाजी महाराज काफी आहत हुए थे। पुणे से नजदीक और मराठाओं की सेना के महत्वूपर्ण यह किला वापस कब्जे में लेने का उन्होंने निर्णय लिया। 
-शिवाजी महाराज की सेना में कई शूर सरदार ने थे, कोंढ़ाणा किले को जीतने की के तैयार थे। लेकिन इस मुहिम के लिए शिवाजी ने तानाजी मालुसरे का चयन किया।
तानाजी शिवाजी के बचपन के दोस्त और उनके खास सरदार थें। उन्होंने कई लड़ाईयों में शिवाजी का साथ दिया था। 
-जब कोंढ़ाणा किले की लड़ाई की तैयारी की जा रही थी, तभी तानाजी के बेटे रायबा की शादी भी की जाने वाली थी। 
-शिवाजी के सरदार शेलार मामा ने तानाजी को रायबा की शादी करने के बाद कोंढाणा किले मुहिम पर जाने की सलाह दी।
-लेकिन तानाजी ने शेलार मामा की बात न मानते हुए कहा 'आधी लग्न कोंढाण्याचं मग रायबाचं (पहले कोंढ़ाणा मुहिम बाद में मेरे बेटे की शादी) 
-तानाजी ने 4 फऱवरी 1672 को अपनी सेना के साथ कोंढ़ाणा किले पर आक्रमण किया, मराठाओं मुगलों को हराकर यह किला जीत लिया लेकिन इसमें तानाजी को अपनी जान गवांनी पड़ी।
-जब शिवाजी महाराज को यह संदेश मिला तो उन्होंने कहा कि, गढ़ मिला लेकिन शेर नहीं रहा। -इसके बाद उन्होंने तानाजी की याद में इस किले का नाम सिंह (शेर) गढ़ रखा। सिंहगढ़ पर तानाजी का स्मारक भी बनाया गया है। 
 
 
शिवाजी के वंशज राजाराम यहीं पर हुआ निधन 
 
यहां पर राजस्थानी पद्धति में बनाया गया मंदिर जैसा घुमट दिखाई देता है वहां पर छत्रपति राजाराम महाराज की समाधि है। 
-मुगल सेना को लगातार 11 साल तक टक्कर देने वाले राजाराम महाराज का निधन उम्र के 30वें साल में 2 मार्च 1700 में सिंहगढ़ पर हुआ था।
-राजाराम महाराज के निधन के बाद यहां पर उनकी समाधि बनाई गई। पेशवाओं ने इस स्मारक का अच्छा खयाल रखा था। 
 

यहां पर तिलक से मिले थे गांधीजी और नेताजी बोस
 
-लोकमान्य तिलक के परपोते शैलेश तिलक ने DainikBhaskar.com को बताया कि, तिलक ने सन 1890 में सिंहगढ़ पर रामलाल नाईक से विश्रामधाम खरीदा था। 
-तिलक यहां पर गर्मियों के दिनों में दो महीने तक रहते थे। यहां पर उन्होंने राष्ट्रवाद की संकल्पना याद आई।
-इसी एेतिहासिक जगह पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 'आर्क्टिक्ट होम्स इन दी वेदाज' इस ग्रंथ का लेखन किया था।
-लोकमान्य तिलक का 'गीता रहस्य' प्रिंट भी यहीं पर 1915 में बनी थी। वहीं गांधीजी और लोकमान्य के बीच उसी साल सिंहगढ़ पर मीटिंग हुई थी।
-इसके बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस भी लोकमान्य तिलक से मिलने  सिंहगढ़ आए थे। नेताजी देखना चाहते की तिलक को राष्ट्रवादी की प्रेरणा किस जगह से मिल रही है।
-नेताजी बोस ने सिंहगढ़ किले के कल्याण दरवाजा के पास  एक घंटे तक मेडिटेशन भी किया था। 
 

बनाया जाएगा म्यूजियम 
 
-शैलेश तिलक ने बताया कि, अब किले पर आठ करोड़ खर्च कर बड़ा म्यूजियम बनाया जाएगा।
- उन्होंने बताया कि, सिंहगढ़ पर डिजीटल टेक्नाॅलाजी का इस्तेमाल कर इतिहास के बारे में जानकारी दी जाएगी।
-शैलेश तिलक के मुताबिक हर साल यहां पर लाखों पर्यटक आते हैं। उन्हें किले के इतिहास के बारे मे सही मायने में जानकारी मिलने के लिए यह काम शुरु किया जाने वाला है। 
 

सिंहगढ़ कैसे पहुंचे ?
 
-पुणे से 32 किलोमीटर दूरी पर दक्षिण पश्चिम दिशा में मौजूद सिहगढ़ किला समुद्र सतह से 4400 उंचाई पर है।
-इस किले पुरंदर राजगढ, तोरणा, लोहगढ़, विसापुर और तुंग किले का प्रदेश दिखाई देता है।
- आप यहां पुणे के स्वारगेट से बस से या प्राइवेट वाहन से जा सकते हैं। 
 

 
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