(डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस की फाइल तस्वीर)
सोलापुर: चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग की भारत यात्रा का आज आखिरी दिन है। जिनपिंग ने सुबह दिल्ली के ताज होटल में भारतीय डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस के परिवार वालों से मुलाकात की। भारत दौरे पर आने वाले चीनी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पिछले कई दशकों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। डॉक्टर कोटनीस को द्वितीय चीन-जापान युद्ध (1937-1945) में उनकी सेवाओं के लिए चीन में बहुत सम्मान के साथ याद किया जाता है। युद्ध के दौरान मेडिकल सेवाओं के लिए चीन की अपील पर भारत से जिन पांच डॉक्टरों को भेजा गया था, कोटनीस भी उनमें शामिल थे।
महाराष्ट्र के सोलापुर में हुआ जन्म
महाराष्ट्र के सोलापुर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. द्वारकानाथ कोटनीस भारत-चीन संबंधों की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में जाने जाते हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान घायल चीनी सैनिकों की सेवा कर इंसानियत, मैत्री और भाईचारे की मिसाल कायम करने वाले डॉक्टर द्वारकानाथ कोटनीस को आज भी चीन में जनता श्रद्धा और प्रेम से याद करती है।
इंडियन मेडिकल ऐड मिशन टू चायना का किया नेतृत्व
वर्ष 1937 में जब जापान ने चीन पर हमला किया तो चीन के तत्कालीन जनरल छू ते ने कांग्रेस पार्टी के नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू से घायल सैनिकों के इलाज में सहायता के लिए चिकित्सक भेजने का अनुरोध किया। देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस पार्टी ने पांच डॉक्टरों के एक टीम को चाइना भेजा। इस टीम को इंडियन मेडिकल ऐड मिशन टू चायना का नाम दिया गया था। इस टीम का नेतृत्व डॉ. कोटनीस ने किया। कुछ दिनों तक चीनी सैनिकों की सेवा करने के बाद चार डॉक्टर तो चीन से भारत लौट आये लेकिन डॉ कोटनीस वहीं डटे रहे। उन्होंने वहां 5 वर्षों तक रहकर जी जान से चीन के सैनिकों की सेवा की।
चीन में एक नर्स से की शादी
चीन में रहने के दौरान मरीजों की सेवा करने वाली एक नर्स गुओ क्विंग लांग से डॉ कोटनीस ने शादी की। गुओ से उनकी पहली मुलाकात डॉ. नार्मन बैथ्यून के मकबरे के उद्घाटन के दौरान हुई और वे उनसे काफी प्रभावित हुईं। उन्हें यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि डॉ. कोटनीस चीनी भाषा बोल सकते थे और कुछ हद तक लिख भी सकते थे, जबकि श्रीमती गुओ नर्स थीं और युद्ध के विनाश के उस माहौल में भी उन दोनों का प्यार परवान चढ़ा और वे दोनों दिसंबर 1941 में
विवाह बंधन में बंध गए। चीन में ही उनके पुत्र 'यिनहुआ' पैदा हुए।
सिर्फ 32 साल की उम्र में हुई मौत
डॉ. कोटनीस बिना सोये कई दिनों तक चीनी सैनिकों का इलाज करते रहे। जिसके कारण उन्हें मिरगी का दौरा पड़ा और 1942 में उनकी सिर्फ 32 साल की उम्र में मौत हो गई। डॉ कोटनीस की मौत के बाद उनकी पत्नी कई साल तक चीन में रहीं। वह कई बार डॉ. कोटनीस के परिवारजनों से मिलने के लिए भारत आईं। इसलिए डॉ. कोटनीस की याद में उन्होंने 'माई लाइफ विद कोटनीस' भी लिखी, जिसमें उन्होंने लिखा है कि भारत और भारत के लोग बहुत अच्छे हैं शायद यह सब वहां की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। साल 2011 में डॉ कोटनीस की पत्नी गुओ क्विंग लांग की मौत हो गई।
चीन में है डॉ कोटनीस की स्मारक
भारत और चीन सरकार ने डॉ कोटनीस पर एक डाक टिकट भी जारी किया। चीन में उनका नाम बेहद सम्मान से लिया जाता है। चीन में उनका एक स्मारक भी बना हुआ है, इसे यहां इसे प्रेरणा स्थल के रूप में देखा जाता है।
वी शांताराम ने डॉ कोटनीस के जीवन पर बनाई फिल्म
फिल्मकार वी शांताराम ने डॉ कोटनीस के जीवन पर 'डॉ.कोटनीस की अमर कहानी' नाम से फिल्म बनाई। जब दोनों देश अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे तो आपसी सहानुभूति थी और रिश्ते ठीक थे। इस दौर में डा. कोटनीस की अमर कहानी जैसी फिल्में बनी। इसमें दोनों देशों के आपसी सौहार्द को दर्शाया गया है। जब दोनों देश आजाद हुए तो उस समय नया जोश था और आपसी रिश्तों में मिठास था।
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