पुणे. इस संस्था के सदस्यों की औसत उम्र 62 साल है। सदस्य वही जिनके जीवनसाथी बिछड़ गए हैं। वे हर रविवार मिलते हैं। सुख-दुख में एक दूसरे को साझीदार बनाते हैं। लेकिन न तो यह वरिष्ठ नागरिक मंच की कोई शाखा है, न कोई पुनर्विवाह मंडल। ये पांच साल से पुणो में सक्रिय ‘आनंद यात्रा’ के सहभागी हैं।
सबकी अपनी कहानी है। डॉ. हेमंत देवस्थली को ही लीजिए। इस समूह के सूत्रधार वे ही हैं। पुणो के एक कॉलेज के प्राचार्य थे। पत्नी वृशाली भी प्राध्यापक थी। 2007 की एक सुबह यूनिवर्सिटी जाते वक्त अंधाधुंध रफ्तार से जा रहे ट्रक ने वृशाली की जान ले ली। इस हादसे ने डॉ. देवस्थली को सन्नाटे में ला दिया था। तीस साल का साथ एक पल में खत्म हो गया। वे तो सेवानिवृत्ति के बाद वृशाली के साथ बाकी की जिंदगी गुजारने के सपने बुन रहे थे। लेकिन उस सुबह अकेले रह गए।
तब उन्हें अपने जैसे दूसरे लोगों का ख्याल आया। उनका जो उम्र के इस पड़ाव पर किसी न किसी कारण से अकेले रह गए हैं। बच्चे नौकरियों के लिए बाहर जा रहे हैं। वृद्ध माता-पिता में से कोई एक हमेशा के लिए अलविदा कह देता है।
ढलती उम्र में अकेलेपन का भयावह अहसास कोई दूसरा नहीं समझ सकता। 2008 में ‘आनंदयात्रा’ की शुरुआत हुई। डॉ. देवस्थली कहते हैं, ‘आनंद यात्रा इस कहानी के एक खुशनुमा अंत की शुरुआत है।’
परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त एक संपन्न महिला के पति की मृत्यु दिल के दौरे से हो गई। बच्चे दूसरे शहरों में हैं। वे कहती हैं, आनंद यात्रा ने एक उम्मीद जगाई है। हमने अपना एक अलग संसार बसा लिया। अब सब तीज-त्योहार साथ मनाते हैं। किसी का जन्म दिन सबके लिए खुशियों से भरा दिन होता है। थोड़ा सैर-सपाटा, थोड़ी गपशप, बच्चों के आने या उनसे फोन पर हुई बातचीत के शुभ समाचार, किसी फिल्म या किताब की चर्चा। वक्त कब निकल जाता है पता ही नहीं चलता।
पांच इलाकों में आनंद यात्रा
अब तक 162 महिला-पुरुष आनंद यात्रा के सहभागी हैं। 2007 में जब डॉ. देवस्थली ने अकेलेपन का दंश झेल रहे लोगों को एक साथ लाने का विज्ञापन दिया था तो करीब 15 लोगों ने संपर्क किया था। इस शुरुआत ने शहर के अलग-अलग इलाकों में रह रहे उन जैसे लोगों में एक नई उम्मीद जगा दी। आज पुणो के पांच इलाकों में ऐसे समूह सक्रिय हैं।