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नेताओं की आश्रमशाला पर गूंजेगी विधानसभा

9 वर्ष पहले
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नागपुर। आदिवासी आश्रमशालाओं में अनियमितता व फर्जीवाड़े का मामला विधानसभा में गर्माने के आसार हैं। विदर्भ में आश्रमशालाओं की धांधली पहले ही उजागर हो चुकी है। इनमें नेताओं व मंत्रियों के नाम भी लिप्त पाए गए हैं। अदालती आदेश के बाद भी इन आश्रमशालाओं पर कार्रवाई नहीं होने की शिकायत को लेकर विधानसभा में मामला उठाया जाएगा। एक सूचना अधिकार कार्यकर्ता ने प्रकरण के कागजातों के साथ मुंबई कूच किया है। नेता प्रतिपक्ष एकनाथ खडसे मामले को विशेष जोर दे रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष दिलीप वलसे पाटील के समक्ष पूरे प्रकरण को रखे जाने की योजना है। गांेदिया की हकीकत हाल ही में गोंदिया की एक आश्रमशाला में 5 बच्चों को सांप ने डंस लिया था। उनमें से 2 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस घटना से पता चलता है कि आश्रमशालाओं में बच्चे सुरक्षित नहीं है। बताया जा रहा है कि अधिकतर आश्रमशालाएं मंत्रियों की हैं। आश्रमशालाओं में बच्चों को उचित सेवा और सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती। अनुदानित आदिवासी आश्रमशाला अन्यायग्रस्त कर्मचारी संघर्ष समिति के सचिव संजय बडवाईक ने २क्११ में सूचना अधिकार कानून के तहत महाराष्ट्र की सभी आश्रमशालाओं के बारे में जानकारी ली थी, जिसमें चौंकानेवाले तथ्य सामने आए हैं। करोड़ों खर्च, श्री बडवाइक ने बताया कि महाराष्ट्र में 556 अनुदानित आदिवासी आश्रमशालाएं हैं। नागपुर विभाग में 152, अमरावती में 125 आश्रमशालाएं हैं। इन आश्रमशालाओं को सरकार की ओर से प्रति विद्यार्थी 960 रु. आहार खर्च और अन्य खर्च दिया जाता है। इसके अलावा आश्रमशाला के लिए सरकारी जमीन और भवन निर्माण का खर्च भी दिया जाता है। सरकार, प्रतिवर्ष आश्रमशालाओं पर करोड़ांे रुपए खर्च करती है, लेकिन इसका फायदा बच्चों को नहीं मिलता। आरोपों की जांच के लिए वर्ष 2010 में न्यायालय ने आदिवासी विकास विभाग के प्रधान सचिव उत्तमराव खोबरागडे को सभी आश्रमशालाओं की जांच के आदेश दिए थे। उन्होंने जिलाधिकारियों के सहयोग से सभी आश्रमशालाओं की जांच शुरू की, जिसमें चौंकानेवाले तथ्य सामने आए। 279 आश्रमशालाएं बोगस जांच में अनुदानित आश्रमशालाओं में से 279 आश्रमशालाएं बोगस पाई गईं। उनमें से 61 आश्रमशालाओं को हमेशा के लिए ताला लगा दिया गया। नासिक के आदिवासी विकास विभाग आयुक्त ज्ञानेश्वर राजुरकर के आदेश पर सभी बोगस आश्रमशाला चालकों पर कार्रवाई की गई, लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनका तबादला हो गया। बाद में यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया। जिन आश्रमशालाओं को बंद कर दिया था, उन्हें आदिवासी विकास मंत्री बबनराव पाचपुते ने फिर से शुरू करा दिया था।

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