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एम्स में कचरे निपटान की होगी बेहतर व्यवस्था

5 वर्ष पहले
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भोपाल डीबी स्टार

इतना ही नहीं इस मामले में एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी इस मामले में आशंका जताई थी कि जब सरकारी अस्पतालों के जैविक कचरे का निष्पादन इंसीनरेटर में नहीं हो रहा है तो फिर क्या इसे तालाब या नालों में बहाया जा रहा है? डीबी स्टार की पड़ताल में पता चला कि सरकारी अस्पतालों से निकलने वाला कचरा निगम के वाहनों से भानपुर खंती पहुंचाया जा रहा है। ऐसे में संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। गौरतलब है कि शहर में करीब दस छोटे निजी इंसीनरेटर हैं, जिनमें संबंधित अस्पताल कचरे का निस्पादन करते हैं। गोविंदपुरा में थोड़ी ज्यादा क्षमता का इंसीनेटर है, लेकिन यह शहर के सभी सरकारी अस्पतालों का वेस्ट नष्ट नहीं कर सकता। इसी को ध्यान में रखते हुए प्राइवेट नर्सिंग होम संचालकों द्वारा नए इंसीनरेटर पर विचार शुरू हो गया है। दूसरी तरफ एम्स प्रबंधन एफ्लुएंट और बायोगैस प्लांट लगाने की योजना पर काम रहा है।

नेशनल हेल्थ मिशन की क्वालिटी इंश्योरेंस सेल के अनुसार प्रदेश के सभी अस्पतालों के बायोमेडिकल वेस्ट को नष्ट करने के लिए कम से कम 10 बड़े नए इंसीनरेटर की जरूरत है। इसका प्रस्ताव भी बना लिया गया है। ये इंसीनरेटर प्राइवेट हॉस्पिटल व नर्सिंग होम्स संचालक, एक सोसायटी बनाकर खोलेंगे। ज्ञात हो कि एक इंसीनरेटर का कवरेज एरिया 150 किमी से अधिक नहीं होना चाहिए।

यह है प्रदेश की स्थिति

रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पताल स्तर तक करीब 2000 अस्पताल हैं। वहीं भोपाल में 30 सरकारी अस्पताल व 400 से ज्यादा क्लीनिक, 220 प्राइवेट नर्सिंग होम और 150 पैथोलॉजी लैब हैं। इनमें से 400 अस्पतालों का ही जैविक कचरा भोपाल इंसीनरेटर पहुंचता है। प्रदेशभर के अस्पतालों में इलाज के दौरान उपयोग होने वाली कॉटन बेंडेज, आईवी फ्लुड बॉटल, सीरिंज, इंजेक्शन और सूचर्स का 110 क्विंटल कचरा निकलता है, जिसमें से बमुश्किल 20 क्विंटल ही इंसीनरेटर में पहुंच पाता है। शेष कचरा अस्पतालों की खाली जमीन में दफना दिया जाता है। इसमें आईवी फ्लुड की बॉटल, इंजेक्शन, सीरिंज, निडिल सहित सर्जिकल मटेरियल नष्ट नहीं होते। इससे मिट्टी प्रदूषित होती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

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