सिर्फ नाम में जिंदा हैं शहर के दरवाजे
नवाब दोस्त मोहम्मद खां के समय बने दरवाजे- पीर दरवाजा, मंगलवारा दरवाजा, इतवारा दरवाजा अब सिर्फ नामों में जिंदा रह गए हैं। इस वक्त बने दरवाजों में सिर्फ जुमेराती दरवाजा अपना वजूद बचाए रखने में कामयाब हुआ है। हालांकि उनके बाद भी शहर में कई दरवाजे बनाए गए, लेकिन वे सब अब खस्ता हाल हो चुके हैं।
इन्हीं में एक दरवाजा था, नक्कार खाने का दरवाजा। इसपर बहुत ही आलीशान फ्रिस्का की पेंटिंग्स बनी हुई थीं। इसके टूटने की घोषणा जब हुई तो मैंने खुद इसे बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन बचा न सका। बिल्डर ने उसे तोड़कर बिल्डिंग खड़ी कर ली। इस तरह एक और दरवाजा शहीद हो गया।
जो दरवाजे बचे हुए थे, उनके बीच से आए दिन रोड की एक परत चढ़ा दी जाती। इस तरह उनकी लंबाई कम होती जा रही थी। इसी वजह से भोपाल के 3 मोहरों में ट्रक टकराने से उसके लगे हुए 5 पत्थर गिर गए। यह 20 साल पुरानी बात है। कई दिनों तक वे पत्थर सड़क पर पड़े रहे। वे इतने वजनी थे कि कोई उन्हें हिला भी नहीं पाता था। आखिर डिपार्टमेंट ने उनकी कॉन्क्रीटिंग करवाने का निर्णय लिया। लेकिन मुझे ये मंजूर न था। इसलिए मैं जयपुर से कारीगर बुलवाए और उन पत्थरों को दरवाजों पर उनकी जगह वापस लगवा लिया।