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वाटर सप्लाई-सीवरेज के प्रोजेक्ट भी नगर निगम के हाथ से जाएंगे

5 वर्ष पहले
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राज्य सरकार ने विदेशी कर्ज से होने वाले विकास कार्यों के अधिकार मप्र अर्बन डेवलपमेंट कंपनी (एमपीयूडीसी) को दे दिए हैं। अब वर्ल्ड बैंक, एडीबी और केएफडब्ल्यू बैंक जर्मनी से मिलने वाले कर्ज की रकम नगरीय निकायों की बजाय कंपनी को मिलेगी। इन तीनों विदेशी एजेंसियों से वाटर सप्लाई के 57 व सीवरेज के 29 प्रोजेक्ट के लिए मप्र को 4500 करोड़ रु. मंजूर हुए हैं। ये प्रोजेक्ट नगर निगम नहीं, यही कंपनी पूरे करेगी। नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग के प्रस्ताव को पिछले माह कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। शेष | पेज 13 पर







स्मार्ट सिटी के लिए बनी स्पेशल परपज व्हीकल (एसपीवी) से बाहर हुए महापौरों को यह दूसरा झटका है।

इस फैसले के पीछे तर्क हैं। यह आम अनुभव हैं कि स्थानीय निकाय बड़े प्रोजेक्ट जमीन पर उतारने के लिए तकनीकी और वित्तीय तौर पर सक्षम नहीं हैं। इससे काम समय पर पूरे नहीं होते। प्रोजेक्ट की लागत बढ़ती है। नई व्यवस्था में प्रोजेक्ट्स की डीपीआर बनाने से लेकर कंसल्टेंट नियुक्त करने का अधिकार कंपनी का होगा। रकम भी राज्य सरकार सीधे कंपनी के खाते में डालेगी। अब तक इन बैंकों से मिलने वाली रकम नगरीय निकायों को दी जाती थी। कंपनी जुलाई से पूरी तरह अस्तित्व में आ जाएगी। शुरुआत में भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस होगा।



गुजरात की तर्ज पर यह प्रयोग:

मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सरकार ने गुजरात की तर्ज पर अर्बन डेवलपमेंट कंपनी का गठन किया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में बनने वाली यह कंपनी नगरीय प्रशासन संचालनालय के अधीन काम करेगी। कंपनी में विभागीय मंत्री और मुख्य सचिव उपाध्यक्ष, वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव, विभागीय प्रमुख सचिव सदस्य और नगरीय प्रशासन आयुक्त सचिव होंगे।



बाजार से भी कर्ज ले सकेगी कंपनी

कंपनी सरकार की गारंटी पर विकास के लिए बाजार से कर्ज ले पाएगी।। कंपनी नगर निगमों के बड़े प्रोजेक्ट पर काम करेगी, वहीं नगर निगम अपने डेवलपमेंट के काम भी कंपनी के एक्सपर्ट्स की सलाह पर ही करेंगे। यानी नगर निगम स्वतंत्र निकाय होने की बात कहकर विकास के नाम पर मनमानी नहीं कर सकेंगे। मौजूदा व्यवस्था में नगर निगमों पर नगरीय प्रशासन संचालनालय का सीधा हस्तक्षेप नहीं है।





यह रहेंगी लोन की शर्तें

योजना का लाभ उन शहरों को मिलेगा, जिनमें अन्य योजनाओं से जल-प्रदाय योजना मंजूर नहीं है। बड़ी नदियों को प्रदूषित करने वाले निकाय, पर्यटन और धार्मिक महत्व के नगरों को इसमें शामिल किया गया है। परियोजना में विश्व बैंक से कर्ज 50% और केंद्र सरकार का अनुदान 50% रहेगा। अन्य शहरों के लिए वित्त व्यवस्था के लिए विश्व बैंक से लोन 70% और मध्यप्रदेश शासन का अंश 30% रहेगा।





महापौरों को विश्वास में लेना था

पहले महापौरों को विश्वास में लेना चाहिए था। कंपनी गठन करने से पहले कोई बातचीत नहीं की गई। चुने हुए जनप्रतिनिधियों को इस तरह अक्षम मानना ठीक नहीं है। हमने स्मार्ट सिटी से महापौरों को बाहर करने पर भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर विरोध दर्ज कराया था। - विवेक नारायण शेजवलकर, महापौर ग्वालियर

लोकतांत्रिक व्यवस्था में महापौर सीधे जनता चुनती है। इसलिए जिस शहर के लिए प्रोजेक्ट लाया जाता है, उसके महापौर को कंपनी में जगह मिलना चाहिए। ताकि वह अपने सुझाव दे सके और फैसले में भागीदार रहे। -आलोक शर्मा, महापौर, भोपाल

शहरों का विकास तेजी से हो सकेगा
जिस तरह से बड़े प्रोजेक्ट आ रहे हैं, उनके लिए तकनीकी एवं वित्तीय दक्षता की आवश्यकता है। यदि किसी प्रोजेक्ट की टेंडरिंग ठीक से नही होती है तो प्रोजेक्ट की कास्ट बढ़ जाती है। काम वक्त पर पूरे नहीं होते। इस कंपनी के माध्यम से सभी बड़े प्रोजेक्ट वरिष्ठ अफसरों व विशेषज्ञों के जरिए पूरे होंगे। इससे विकास तेजी से होगा। -मलय श्रीवास्तव, प्रमुख सचिव, नगरीय विकास एवं पर्यावरण

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