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बच्चे की सेहत के लिए जरूरी है जागरुकता

6 वर्ष पहले
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ट्रेन तेज रफ्तार के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ी जा रही थी और मैं कौतूहल से देख रही थी, उस नई नवेली मां को जो अपने नन्हे शिशु के साथ सफर कर रही थी। वैसे तो जगजाहिर है कि मां के दूध का कोई विकल्प नहीं है, लेकिन कभी-कभी दूध बॉटल से भी पिलाना पड़ता है और वह मां यही कर रही थी। बच्चे को उसने अपने साथ सफर कर रही एक युवती को थमाया। उसने अपने बड़े से ब्रांडेड बेबी बैग से फीडिंग बॉटल, दूध पाउडर के डिब्बे और पानी का थरमस निकाला और साइड टेबल पर रख दिया। अपने हाथ पोछने के लिए एक नैपकिन उठाया और अपनी ड्रेस बचाने के लिए उसी नैपिकन को अपनी गोद में बिछा दिया। बस, वहीं से मेरा कौतूहल खत्म होकर हैरत और फिर धीरे-धीरे गुस्से में बदल गया, क्योंकि यह सारी खूबसूरती बेकार थी। इस दौरान उसने ऐसी गतिविधि की, जिससे बच्चे को शर्तिया घर पहुंचते ही दस्त लग जाते। बच्चे को बाहरी दूध देने के वक्त सबसे ज्यादा जरूरी है कि उसमें उपयोग होने वाले सभी पात्र स्टरलाइज़्ड यानी माइक्रोब मुक्त हो। माइक्रोब का अर्थ है बैक्टीरिया, वायरस आदि। लोग समझते हैं कि केवल बॉटल उबाल लेने से काम चल जाता है, मगर ऐसा नहीं है। अगर आपने उबली हुई बोतल का ढक्कन, निप्पल या निप्पल फंसाने का रिंग मेज़ पर, फर्श पर या फिर अपने हाथ की मुट्ठी में ही क्यों न रख लिया हो, वह माइक्रोब फ्री नहीं रहता। उस मां ने तो निप्पल लगा ढक्कन डिब्बे की साइड टेबल पर रख दिया था, जिसके माइक्रोब की मात्रा बताने के लिए सारी गिनती कम पड़ जाती। याद रखने की बात यह है कि साफ का मतलब सिर्फ देखने में ही साफ नहीं बल्कि माइक्रोब से भी साफ। जो दिखते नहीं हैं नुकसान ज्यादा करते हैं। बच्चों के संदर्भ में तो यह बेहद महत्वपूर्ण है।

डॉ. नीलकमल कपूर एम्स, भोपाल में पैथोलॉजी व लैब मेडिसिन विभाग की अध्यक्ष हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।