माय बस में यात्री सुरक्षा के तमाम दावे फेल
कोई भी व्यवस्था ऐसी नहीं जो 100 फीसदी पूरी हुई हो
सीधी बात
भोपाल सिटी लिंक लिमिटेड (बीसीएलएल) ने लो फ्लोर बसों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए 15 करोड़ रुपए के खर्च से कई नई तकनीकें और व्यवस्थाएं कीं। इनमें सीसीटीवी कैमरे, जीपीएस, अनाउंसमेंट सिस्टम,ऑटोमैटिक किराया मशीन जैसे उपकरण लगाए भी गए। लेकिन हकीकत में सभी सुविधाएं या तो नाममात्र के लिए चल रही हैं, या इनसे आम लोगों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। बेंगलुरू की हरमन इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को ज्यादातर कामों के ठेके दिए गए। इन सब के पीछे बीसीएलएल के अफसर तकनीकी खराबी कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं। पहले की ही व्यवस्थाएं अधूरी हैं और अब बीसीएलएल ने महापौर पास बनाने का नया काम शुरू कर दिया है। फिलहाल इसका हश्र भी शुरूआत में ही डांवाडोल होता नजर आ रहा है। किए गए दावे के मुताबिक तय संख्या में न तो सेेंटर खोले गए और लोगों को ठीक से रिस्पांस भी नहीं मिल रहा है। लो फ्लोर बसों में किए गए कामों के हालात बताती एक रिपोर्ट...
...अब दे दिया कार्ड का ठेका
महापौर पास बनाने के लिए कंपनी को तीन स्थानों पर पाइंट ऑफ सेल्स केंद्र खोलने थे।
हकीकत- कंपनी अभी तक आईएसबीटी में एक सेंटर शुरू कर पाई है। जबकि जवाहर चौक, चलित वाहन अभी तक शुरू नहीं हो पाया है।
दो दिन के भीतर प्रसन्ना कंपनी के कॉल सेंटर पर माय बस के पास बनाने के लिए 200 लोग फोन कर चुके हैं। पर यहां सेंटर शुरू ही नहीं हो पाया है।
डिस्प्ले बोर्ड भी बंद
बस स्टॉप पर आने वाली बसों की जानकारी डिस्प्ले करने के लिए बोर्ड लगाने की जिम्मा दिया था।
हकीकत- शहर के 160 बस स्टॉप पर डिस्प्ले बोर्ड बंद पड़े हैं। मात्र 10 ही चालू हैं।
फेयर कलेक्शन मशीन
कंपनी को 82 स्टॉप पर ऑटोमैटिक टिकट वेंडिंग मशीन, 164 बैरिकेट सेंसर गेट, 164 फेयर गेट लगाने का काम मिला था। इसमें से कैमरा व इलेक्ट्रॉनिक टिकट मशीन ही लगी।
हकीकत- बोर्ड ऑफिस चौराहे के पास एक मात्र बस स्टॉप पर ऑटोमैटिक फेयर कलेक्शन मशीन लगाई गई। यह भी आज तक चालू नहीं हो पाई है। शहर के किसी भी बस स्टॉप पर कोई भी सेंसर गेट नहीं लग पाए हैं।
परफॉरमेंस के आधार पर दिया गया टेंडर
एक ही कंपनी को बार-बार काम का ठेका क्यों दिया गया?
टेंडर के लिए दूसरी कंपनियों ने भाग लिया था। कंपनी की परफॉरमेंस के आधार पर टेंडर दिया गया।
महापौर पास के लिए भी इसी कंपनी को टेंडर दिया गया। जबकि पहले के पेंडिंग काम अभी तक कंपनी नहीं कर पाई है?
हरमन इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को जो काम दिए गए थे, उसमें निगम की कुछ कमी रही। इसलिए काम पूरे नहीं हो पाए।
जीपीएस अौर पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम
2010 में नगर निगम ने बसों जीपीएस और पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम लगाने के लिए टेंडर जारी किए थे। दावा किया गया था कि जीपीएस से बसों की सटीक लोकेशन मिलेगी। अनाउंसमेंट सिस्टम से आने वाले बस स्टॉप की जानकारी मिल सकेगी।
हकीकत- शहर की 8 रूटों पर चल रही 150 बसों पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम लगा है। लेकिन वो काम नहीं कर रहा है। जीपीएस हैं, लेकिन यह भी ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। ज्यादातर बसों की लोकेशन के लिए ऑपरेटरों को फोन करना पड़ा है।
सीसीटीवी कैमरे
225 बसों में कैमरे लगाए गए। इन पर 8 लाख रुपए खर्च किए गए। बसों में कैमरे लगाने का जिम्मा हरमन इंटरनेशनल को सौंपा गया था। कंपनी का दावा था कि बस में इससे आपराधिक गतिविधियों सहित स्टाफ के रवैये पर भी नजर रखी जाएगी।
हकीकत-मात्र 70 बसों में ही कैमरों की रिकॉर्डिंग चालू है। जिन बसों में रिकॉडिंग चालू भी है तो उसमें लोगों की आवाज सुनाई नहीं दी देती है। अधिकतर बसों में वायरिंग खराब है। तकनीकी समस्याओं के चलते ये कैमरे बंद पड़े हैं। आपराधिक गतिविधियों के फुटेज उपलब्ध नहीं।
तेजस्वी एस नायक, आयुक्त नगर निगम