भोपाल. एक साल पहले पढ़ाई पूरी करने के बाद सांत्वना अरस ने हाल ही में चार्टर्ड अकाउंटेंसी की एक फर्म पार्टनरशिप में शुरू की है। सांत्वना बचपन से ही हाथ पांव से लाचार है। व्हीलचेयर ही एकमात्र सहारा है।
बायां हाथ तो काम ही नहीं करता। किताब के पन्ने पलटना तक संभव नहीं। लिखने की स्पीड भी बहुत धीमी। मगर इन दिनों उसके हाथ में काम ज्यादा है। 32 साल की सांत्वना ऊर्जा और आत्मविश्वास से भरी है। बैंक और कई दूसरी संस्थाओं के ऑडिट में इन दिनों व्यस्त है। सीए बनना उसकी एक एेसी विकट जिद का नतीजा है, जिसे उसने बालपन से जीया। परिचित तो उसकी हालत देखकर हमेशा पढ़ाई छोड़ने की सलाह देते रहे। पिताजी स्कूटर पर बैठा कर स्कूल ले जाते। एक व्हील चेयर घर पर थी, दूसरी स्कूल में।
पन्ने पलटने और पेन खोलने में भी परेशानी
सीए की परीक्षा के लिए वह तीन-चार पेन ढक्कन खोल कर लेकर जाती। पन्ने पलटने और पेन खोलने में भी परेशानी थी। केवल आधा घंटा एक्स्ट्रा टाइम मिलता था। सीए फाइनल में डेढ़ घंटा एक्स्ट्रा मिला। सेहत की बंदिशें ऐसी रहीं कि परीक्षा में न तो खिड़की के पास बैठ पाती, न ही उसके पास का पंखा चलाया जा सकता था। पसीना आए तो भी सहयोगी की मदद लगे। एक बार उसे खिड़की के पास सीट मिली। प्रश्न पत्र हवा में उड़ गया। वहां मौजूद टीचर ने पेपर उठाकर दिया। आर्टिकलशिप के समय ज्यादातर सीए के ऑफिस फ़र्स्ट फ्लोर पर थे। उसके लिए कोई तैयार नहीं था। शक्ति नगर में सीए विनीता माथुर आर्टिकलशिप के लिए तैयार हुई।
व्हील चेयर पर काम करती है।
आज वह एक वैन में व्हील चेयर पर बैंक पहुंचती है। व्हील चेयर पर काम करती है। घर व दफ्तर में उसकी दुनिया ग्राउंड फ्लोर पर ही फैली रही है, क्योंकि वह कभी सीढ़ियां चढ़ने लायक नहीं रही। भेल से रिटायर्ड इंजीनियर पिता डीके अरस बताते हैं-7 वीं तक की पढ़ाई घर पर की। 12वीं में उसने 74 % अंक मिले। उसने कभी अहसास ही नहीं होने दिया कि वह किसी से कुछ कम है।