भोपाल. गोंड परिधान चित्रकला एक ऐसी जनजातीय चित्रकला है जो प्रचलित चित्रकला से हटकर अपनी एक विशेष शैली के कारण वर्तमान में अपनी अलग पहचान बना रही है। भारत भवन के निर्माण के समय यह कला गांव से निकलकर भोपाल जैसे शहर में आईं। इस गोंड कला के वर्तमान में कुछ स्थापित कलाकार भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी विशेष स्थान बना चुके हैं।
इस कला के लिए देश-विदेश में अपनी पहचान बना रही हैं, साकेत नगर निवासी डाॅ. आरती अग्रवाल। उन्होंने घर परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए हाल ही में चित्रकला (फाइन आर्ट्स) के क्षेत्र में पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की है। यह सीआईआईआईडब्ल्युएन के महिला विंग की सक्रिय सदस्य भी हैं। इन महिला कलाकारों को पहचान दिलाने का लक्ष्य लेकर तथा इन महिला कलाकारों को कला जगत में स्थान दिलाने के लिए नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में पिछले दिनों प्रदर्शनी आयोजित की।
इस प्रदर्शनी में देश-विदेश के कला प्रेमियों ने भी बहुत सराहा। निकट भविष्य में ऐसे ही अन्य स्थानों पर प्रदर्शनी लगा कर इस दिशा में प्रयासरत हैं। इस प्रदर्शनी में भाग लेकर आईं आरती के अनुसार अब गोंड चित्रकला भित्तियों से निकलकर कागज और कैनवास पर आ गई है। कलाकारों के चित्र बिकने लगे हैं।
समकालीन कला के क्षेत्र में गोंड कला ने चित्रों में अपनी जगह बना ली है। गोंड कलाकारों को कई देशों में भी अब आमंत्रित किया जाने लगा है। साथ ही इन पर फिल्में और वृत्तचित्र भी बनने लगे हैं। जिनमें मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के ग्राम पाटनगढ़ के चित्रकारों ने देश व विदेशों में अपनी चित्र परंपरा का प्रदर्शन कर अपने ग्राम, जिले, राज्य एवं देश का नाम रोशन किया है।
महिलाओं का योगदान
इस चित्रकला में गोंड परिधान के लिए महिलाओं का भी कम योगदान नहीं है। इससे जहां महिला चित्रकारों ने इस कला को परिपूर्णता के साथ भावात्मक भी बना दिया, वहीं यह चित्रकला और भी निखर गई। घर की दीवारों की साज-सज्जा में उनके महत्वपूर्ण योगदान को नकारा नहीं जा सकता।
मंगली, कमला, धनेश्वरी, कमली, धनैया, संतोषी, रामबाई, सुशीला व दीपिका आदि वे महिलाएं हैं, जिन्होंने गोंड चित्रकारी को मध्य प्रदेश के दूरस्थ गांव से दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया।