तात्या टोपे ने अंग्रेजों पर विजय हासिल की तो नाम रखा विजयपुर / तात्या टोपे ने अंग्रेजों पर विजय हासिल की तो नाम रखा विजयपुर

सन‌् 1982 से 1985 तक कक्षा 3 की भूगोल में भी हुआ है विजयपुर गांव में तात्या टोपे और अंग्रेजों के बीच हुए युद्ध का जिक्र।

Bhaskar News

Aug 15, 2016, 06:42 AM IST
डेमो फोटो। डेमो फोटो।
गुना/भोपाल. गुना जिले में एक कस्बा है विजयपुर। इस गांव का नाम विजयपुर क्यों पड़ा? इसका रहस्य जानने के लिए हमें आजादी की पहली लड़ाई यानी 1857 के दौर में जाना होगा।
दरअसल, क्रांतिकारी तात्या टोपे अंग्रेजों को खदेड़नेे के लिए आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। वे राघौगढ़ के समीप एक पहाड़ी पर बने गांव से गुजर रहे थे। वहां अंग्रेजों की फौज से उनकी मुठभेड़ हुई। तात्या टोपे ने अंग्रेजी फौज का डटकर मुकाबला किया और अंतत: उसेे हरा दिया। इसी विजय की खुशी में उस गांव का नाम विजयपुर रख दिया गया। गुना जिले के विजयपुर गांव में तात्या टोपे ने अंग्रेजी फौज को हराकर जनरल लेफ्टिनेंट को मार गिराया था। इसलिए गांव का नाम विजयपुर पड़ा है। गांव में आज भी जनरल लेफ्टिनेंट की 158 साल पुरानी अष्टधातु की कब्र बनी हुई है।
तात्या टोपे का अंग्रेजों की सेना से भिड़ंत हुई
राघौगढ़ तहसील व नगरपालिका परिषद राघौगढ़- विजयपुर के वार्ड 16 के तहत आने वाले विजयपुर गांव की पहाड़ी पर सन 1858 में तात्या टोपे का अंग्रेजों की सेना से भिड़ंत हुई थी। जहां 5 सितंबर 1858 को तात्या टोपे ने अंग्रेजी सेना को हराया था। इसमें अंग्रेजी फौज के सेनापति जनरल- 2 लेफ्टिनेंट अलेक्ट जेंडर फारवर्ड को भी इसी पहाड़ी पर मार दिया था। बाद में वह उनकी सेना के साथ जंगल के रास्ते आगे रवाना हो गए थे। इसके बाद जंगल के रास्ते आगे रवाना हो गए थे। अगले पड़ाव में वह ईसागढ़ जिले के (वर्तमान गुना जिले के) पाड़ौन में राजा के यहां 18 अप्रैल 1859 को रात में सोते समय मित्रघात से अंग्रेजी फौज ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।
आज भी है अंग्रेजी फौज के सेनापति की कब्र
विजयपुर गांव में आज भी तात्या टोपे के हाथों मारे गए अंग्रेजी फौज सेनापति जनरल-2 लेफ्टिनेंट अलेक्ट जेंडर फारवर्ड की 5 सितंबर 1856 की कब्र बनी हुई है। हालांकि अष्टधातु की बनी इस कब्र के ऊपर अंग्रेजी फौज सेनापति की पूरी जानकारी लिखी हुई थी। करीब 20 साल पहले चारों ने इसका ढक्कन तोड़ दिया है। इससे अब इसके ऊपर अंकित जानकारी मिट गई है, लेकिन गांव के बुजुर्गों को इसकी पूरी जानकारी है।
पाठ्यक्रम में भी हुआ जिक्र
विजयपुर गांव में तात्या टोपे और अंग्रेजी फौज के बीच हुए युद्ध का जिक्र सन 1982 से 1985 तक प्राथमिक शाला की कक्षा 3 के भूगोल में भी किया गया है। विजयपुर गांव के माध्यमिक विद्यालय के प्रधान अध्यापक महेश कुमार भार्गव ने बताया कि सन 1982 से 85 के बीच जिले के विशेष स्थलों में इसे प्राइमरी स्कूल के पाठ्यक्रम में पढ़ाया गया है। हालांकि बाद में पाठ्यक्रम से इसे हटा दिया गया है।
तब पहाड़ी पर बसा गांव था विजयपुर
विजयपुर की पहाड़ी पर तात्या टोपे ने अंग्रेजी फौज को हराया था। गांव के 87 वर्षीय रामचरण साहू, समरथ सिंह धाकड़ ने बताया कि जिस समय जहां तात्या टोपे का अंग्रेजी सेना से युद्ध हुआ था, उस वक्त जहां जंगली और पहाड़ी क्षेत्र हुआ करता था। जहां तात्या टोपे ने अंग्रेजी सेना को मार गिराया था। तभी से इस गांव का नाम विजयपुर पड़ गया।
लाजो ने बोया था 1857 की क्रांति का बीज
अंग्रेजों के खिलाफ देश में माहौल तभी बनने लगा था जब उन्होंने अपनी साम्राज्यवादी सोच को विस्तार देना शुरू किया। जहां भी उनकी ज्यादतियां हदें लांघती वहां विरोध मुखर हो जाता। यह विरोध असंगठित होने के कारण ज्यादा बलवती नहीं हो पाता था। फिर भी कहीं न कहीं अंग्रेजों के जुल्मों के खिलाफ आक्रोश रूपी चिंगारी सुलगती ही रही। 1824 में कर्नाटका के कित्तूर की रानी चेनम्मा हों या 1857 में क्रांति की पताका थामने वाले रानी लक्ष्मीबाई व बेगम हजरत महल, सभी ने अंग्रेजों का मुकाबला रणचंडी का रूपधारण कर किया। 1857 की क्रांति का सूत्रपात भी एक महिला ने ही किया था।

अब तक हम सभी ने यही पढ़ा और सुना है कि बैरकपुर में मंगल पाण्डे के विद्रोह के कारण 1857 की क्रांति भड़की थी। यह इसलिए कि चर्बी वाले कारतूसों के खिलाफ सबसे पहले बगावत उन्होंने ही की थी। यह कम ही जानते हैं कि इस घटना के पीछे एक महिला की सक्रियता की कहानी जुड़ी है। दरअसल मंगल पांडे को चर्बी वाले कारतूसों के बारे में मातादीन ने बताया था। मातादीन की पत्नी का नाम लाजो था जो अंग्रेज अफसरों के यहां काम करती थी। इसी दौरान उसे यह पता लगा कि अंग्रेज गाय की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे हैं। लाजो ने यह बात पति मातादीन को बताई। इसके बाद 9 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह करने पर 85 भारतीय सिपाहियों को हथकड़ी-बेड़ियां पहनाकर जेल भेज दिया गया। इसी दिन बाकी सिपाही शाम को घूमने निकले। उन्हें देख मेरठ शहर की महिलाओं ने उन पर फब्तियां कसीं। उन्होंने कहा- छी! तुम्हारे भाई जेलखाने में हैं और तुम यहां बाजार में मक्खियां मार रहे हो। तुम्हारे जीने पर धिक्कार है।’ यह सुनते ही सिपाही आग-बबूला हो गए और 10 मई को जेल तोड़कर सभी कैदी सिपाहियों को आजाद करा लिया। इसके बाद भी महिलाएं अंग्रेजों के खिलाफ पूरी ताकत के साथ मुखर हुईं और जब-जब किसी महिला ने हुंकार भरी तो ब्रिटिश हुकूमत को मुंह की ही खानी पड़ी। ऐसी कई वीरांगनाएं मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों, कस्बों और गांवों में सक्रिय रहीं। इनमें से कुछ ने तो राष्ट्रीय स्तर पर भी आवाज बुलंद की।
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