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इस पेड़ के नीचे अंग्रेजों ने 356 क्रांतिकारियों को एक साथ मारी गई थी गोलियां

Dainik Bhaskar

Aug 15, 2017, 12:04 AM IST

इस स्थान पर जनरल ह्यूरोज ने 14 जनवरी 1858 को 356 क्रांतिकारियों को एक साथ गोली मारने का आदेश सुनाया था।

चांदमारी के इस पेड़ के नीचे बना है शहीद स्मारक। चांदमारी के इस पेड़ के नीचे बना है शहीद स्मारक।
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भोपाल(मध्यप्रदेश). राजधानी से 40 km दूर सीहोर के चांदमारी के मैदान में 14 जनवरी 1858 को 356 क्रांतिकारियों को एकसाथ गोलियां मारी गई थी। इस बर्बरतापूर्ण घटना को जलियांवालाबाग हत्याकांड की तरह ही देखा जाता है। इस जगह पर शहीद स्मारक भी बनाया गया है। हर साल प्रशासनिक कार्यक्रम भी होते है। आपको बता दें सीहोर अंग्रेजों की रेजीमेंट थी। जनरल ह्यूरोज के नेतृत्व में इस घटना को अंजाम दिया गया था। शवों को पेड़ों पर लटकाकर छोड़ दिया था...
(स्वतंत्रता दिवस के मौके पर DainikBhaskar.com ने शहर के एक्सपर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेज के आधार पर इस घटना की जानकारी जुटाई गई है। उस मैदान की तस्वीरें भी इकट्ठा की हैं, जहां इस बर्बरतापूर्ण हत्याकांड को अंजाम दिया गया था। )
- 1857 को पूरे देश में अंग्रेजी हूकुमत के खिलाफ बगावत शुरू हो गई थी। इस विद्रोह को कुचलने कि लिए ह्यूरोज को इंग्लैंड से बुलाया गया था। एक बड़ी सेना के साथ सेंट्रल इंडिया फील्ड फोर्स को लीड करते हुए मऊ (इंदौर) के रास्ते सीहोर पहुंचा था।
- वे मुंबई के रास्ते होते हुए झांसी के लिए निकला था लेकिन रास्ते में पता चला कि सीहोर में सैनिक विद्रोह कर एक स्वतंत्र सरकार बना ली है। इस संबंध में भोपाल बेगम से पूछताछ की गई। इसके बाद बेगम ने ह्यूरोज से सिपाही बहादुर सरकार को खत्म करने और जेल में बंद 356 क्रांतिकारियों को सजा ए मौत देने के लिए अपील की।
- इसके बाद बख्शी मुरव्वत ने जनरल ह्यूरोज को घटना की सारी जानकारी दी। ह्यूरोज ने सभी को फांसी पर लटकाने के आदेश दिया। 14 जनवरी 1858 तो सभी कैदियों को जेल से निकालकर सीवन नदी किनारे बेगन घाट सैकड़ाखेड़ी चांदमारी मैदान में लाया गया ।
- 'हयाते सिकंदरी' भोपाल स्टेट की बेगम की स्मृति के मुताबिक 356 क्रांतिकारियों के हाथ और पैरों को जंजीरों से बांधा गया था। ह्यूरोज के आदेश पर एक साथ 356 क्रांतिकारियों को बंदूकों से उड़ा दिया गया।
- बताते हैं कि उस समय ह्यूरोज को क्रांतिकारियों के शव देखने के खूब शौक था। उसने इन क्रांतिकारियों के शव पेड़ों पर लटकाने के आदेश दिए। इन शवों को पेड़ों पर लटकाकर छोड़ दिया गया था। जिसके दो से तीन दिन बाद ग्रामीणों ने पेड़ से उतारकर इसी मैदान में दफनाया था।
कैसे शुरू हुआ था विद्रोह...
- दिल्ली मेवाड़ यूपी से होती हुई बगावती चपातियां सीहोर आई। 13 जून 1857 में सीहोर के ग्रामीण इलाकों में पहुंच चुकी थी। मेरठ की क्रांति से पहले ही सीहोर में क्रांति की चिंगारी सुलग गईं। इस समय भोपाल रियासत में बेगम सिकंदर जहां का शासन था। उन्हें अंग्रेजों का सबसे वफादार कहा जाता था।
- 1 मई 1857 में सेना में एक बगावती पोस्टर की कॉपी बांटी गई थी। इसके बाद से यहां विद्रोह शुरू हुआ था। हालात बिगड़ने के बाद सीहोर में रहने वाले पॉलिटिकल एजेंट मेजर हैनरी विलियम रिकॉर्डस और अंग्रेजी स्टाफ ने शहर छोड़ दिया। तीन दिन बाद 10 जुलाई 1857 को पॉलिटिकल एजेंट और उनके अंग्रेज परिवार भोपाल होते हुए होशंगाबाद रवाना हो गए।
- इससे पहले पूरी फौज का चार्ज 9 जुलाई को पॉलिटिकल एजेंट ने भोपाल रियासत को दे दिया था। सीहोर के बगावती तेवर को देखकर बैरासिया पर भी असर पड़ा था। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की 2 तोपें भी अपने कब्जे में कर ली थी। जांच के बाद तोप एक क्रांतिकारी सिपाही के घर से बरामद की गई थी।
- 1 अगस्त 1857 को बख्शी मुरव्वत मोहम्मद खां ने छावनी के सैनिकों की हाजिरी लगाई और नए कारतूस दिए। इसके बाद पूरी सेना में बात फैल गई थी कि इन कारतूसों में सूअर और गाय की चर्बी लगी हुई है। जिससे बगावत के सुर और और तेज हो गए।
- 6 अगस्त को मिलावट के खिलाफ जांच के आदेश मिले। ये जांच उस समय के न्यायिक और अपराध विभाग के प्रमुख श्री गणेशराम की देखरेख में की गई। जांच में सुअर और गाय की चर्बी के इस्तेमाल की बात सामने आई। इसके बाद जनाक्रोश और बढ़ गया।
वलीशाह और महावीर कोठ दो अहम क्रांतिकारी...
- सीहोर स्थित सैनिकों के रिसालेदार वलीशाह ने क्रांतिकारियों को संबोधित करते हुए पहला क्रांतिकारी भाषण दिया। इसमें बगावत को नेतृत्व दे रहे महावीर कोठ की गिरफ्तारी का जिक्र किया गया तो सैनिक और भड़क गए थे।
- सैनिकों ने सीहोर कॉन्टिनेंट पर लगा अंग्रेजों का झंडा उतार कर जला दिया और महावीर कोठ और वलीशाह के संयुक्त नेतृत्व में स्वतंत्र सिपाही बहादुर सरकार का ऐलान किया। यह देश की पहली स्वतंत्र सरकार थी।
- महावीर कोठ ने दो झंडो के नीचे सरकार स्थापित करने को कहा जिसमें पहला झंडा निशाने महावीर जो भगवा रंग का प्रतीक था और दूसरा निशाने मोहम्मदी कहलाया जो हरा रंग का था।
आगे की स्लाइडस् में देखें ऐतिहासिक घटनास्थल से जुड़ी फोटोज..

महावीर कोठ का चित्र जिसे शहर के आर्टिस्ट तरूण सागर ने दस्तावेज के आधार पर बनाया है। महावीर कोठ का चित्र जिसे शहर के आर्टिस्ट तरूण सागर ने दस्तावेज के आधार पर बनाया है।
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हर साल यहां प्रशासनिक कार्यक्रम होते हैं। हर साल यहां प्रशासनिक कार्यक्रम होते हैं।
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इसी मैदान पर क्रांतिकारियों को भूना गया था। इसी मैदान पर क्रांतिकारियों को भूना गया था।
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क्रांतिकारियों को मारने के बाद पेड़ पर लटका दिया गया था। क्रांतिकारियों को मारने के बाद पेड़ पर लटका दिया गया था।
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इतिहास में दर्ज है यह घटना। इतिहास में दर्ज है यह घटना।
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शहर के कई स्थानों पर इस तरह की कब्र देखने को मिल जाती हैं, जो अब बिल्कुल बदहाल स्थिती में हैं। शहर के कई स्थानों पर इस तरह की कब्र देखने को मिल जाती हैं, जो अब बिल्कुल बदहाल स्थिती में हैं।
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दूर से ऐसा दिखाई देता है पेड़। दूर से ऐसा दिखाई देता है पेड़।
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सड़क किनारे लगा हुआ है शहीद स्मारक को इंगित करता बोर्ड। सड़क किनारे लगा हुआ है शहीद स्मारक को इंगित करता बोर्ड।
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इस जगह को चांदमारी का मैदान कहा जाता है, चांदमारी का अर्थ सैनिकों का अभ्यासस्थल होता है। इस जगह को चांदमारी का मैदान कहा जाता है, चांदमारी का अर्थ सैनिकों का अभ्यासस्थल होता है।
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Bhopal-Sehore-MadhyaPradesh-Under tree, revolutionaries killed together by British
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चांदमारी के इस पेड़ के नीचे बना है शहीद स्मारक।चांदमारी के इस पेड़ के नीचे बना है शहीद स्मारक।
महावीर कोठ का चित्र जिसे शहर के आर्टिस्ट तरूण सागर ने दस्तावेज के आधार पर बनाया है।महावीर कोठ का चित्र जिसे शहर के आर्टिस्ट तरूण सागर ने दस्तावेज के आधार पर बनाया है।
हर साल यहां प्रशासनिक कार्यक्रम होते हैं।हर साल यहां प्रशासनिक कार्यक्रम होते हैं।
इसी मैदान पर क्रांतिकारियों को भूना गया था।इसी मैदान पर क्रांतिकारियों को भूना गया था।
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शहर के कई स्थानों पर इस तरह की कब्र देखने को मिल जाती हैं, जो अब बिल्कुल बदहाल स्थिती में हैं।शहर के कई स्थानों पर इस तरह की कब्र देखने को मिल जाती हैं, जो अब बिल्कुल बदहाल स्थिती में हैं।
दूर से ऐसा दिखाई देता है पेड़।दूर से ऐसा दिखाई देता है पेड़।
सड़क किनारे लगा हुआ है शहीद स्मारक को इंगित करता बोर्ड।सड़क किनारे लगा हुआ है शहीद स्मारक को इंगित करता बोर्ड।
इस जगह को चांदमारी का मैदान कहा जाता है, चांदमारी का अर्थ सैनिकों का अभ्यासस्थल होता है।इस जगह को चांदमारी का मैदान कहा जाता है, चांदमारी का अर्थ सैनिकों का अभ्यासस्थल होता है।
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