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पर्यावरण की शुद्धि के लिए जरूरी है अग्निहोत्र

7 वर्ष पहले
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संत हिरदाराम नगर भास्कर. भोपाल

अग्निहोत्र एक वैदिक हवन पद्धति है। पर्यावरण की शुद्धि के लिए किए जाने वाले अग्निहोत्र को आज कई लोग सीखकर अपने घरों में भी करने लगे हैं। एक बार अग्निहोत्र से 8सौ घन फिट के कीटाणु निष्क्रिय हो जाते हैं। अग्निहोत्र एक ऐसी-हवन पद्धति है जिसमें समय तो कम लगता ही है इसे आसानी से किया भी जा सकता है।

संत हिरदाराम नगर से कुछ ही दूरी पर इंदौर हाईवे पर स्थित माधव आश्रम में इस समय अग्निहोत्र को सीखने के लिए प्रतिदिन 10-15 लोग रहे हैं। आश्रम द्वारा अग्निहोत्र का प्रचार-प्रसार बढ़ाने के लिए नि:शुल्क सिखाया भी जाता है। अग्निहोत्र की विधि और प्रक्रिया भी काफी सरल होने और लाभ अधिक होने से लोग अपने जीवन में अग्निहोत्र का महत्व समझने लगे हैं। यही कारण है कि आज अग्निहोत्र पूरी दुनिया में फैल चुका है, जिसकी शुरुआत माधव आश्रम से 1973 में हुई। जबसे लगातार यहां अग्निहोत्र होता है और आम लोगों को भी सिखाया जाता है।

करीब 9 एकड़ में फैले इस माधव आश्रम में अग्निहोत्र के अलावा कई अन्य गतिविधियां भी संचालित होती हैं।

कैसेहोता है अग्निहोत्र

अग्निहोत्रसूर्याेदय और सूर्यास्त के समय ही होता है। इसे कोई भी कर सकता है और नियमित करना होता है। अग्निहोत्र करने के लिए तांबे या मिट्टी का एक पेरामिड आकार का पात्र लें। इस पात्र में गाय के गोबर के कंडो को टुकड्े करके डाल दें। इसके बाद दो चुटकी चावल को गाय के घी के साथ मिला लें, फिर पत्र में रखे कंडों को कपूर डालकर आग लगा दें। अग्नेय स्वाहा कहकर आहुति देते हुए शेष मंत्र अग्नये इदम मम कहें। तुरंत बाद हथेली पर रखे हुए चावल उठाएं और बोलें प्रजापतये स्वाहा, चावल आग में छोड़ते हुए कहें, प्रजापतये इदम मम। दोनों आहुतियों के जलने में दो मिनट लगेंगे। ऐसी ही शाम की विधि है।

युवाओंका शिविर

आश्रममें साल में कई बार युवाओं के लिए शिविर आयोजित किए जाते हैं। शिविर में युवाओं को अग्निहोत्र, चिकित्सा इलाज, खेती पर्यावरण शुद्धि के विषय में जानकारी प्रशिक्षण दिया जाता है। यह सब नि:शुल्क होता है।

माधव आश्रम में अिग्नहोत्र करते लोग।

>एक बार के अग्निहोत्र से निष्क्रिय हो जाते हैं 8 सौ घन फिट के कीटाणु >लोग सीख रहे अग्निहोत्र