दरअसल, सभी स्वार्थी होते हैं
जिंदगी के बेहतर डायरेक्टर बनें
आपकेसाथ या जिंदगी में जो भी घटित होता है वह आप तय करते हैं। दरअसल इसका ज्यादातर हिस्सा अचेतन मन द्वारा किया जाता है, इसलिए हमें ऐसा लगता है कि जिंदगी में जो भी घटित हो रहा है, वह अपने आप हो रहा है। जिंदगी भी एक फिल्म की तरह है। इसे अच्छा करना हो तो बेहतर डायरेक्टर बनें। जो आपको पसंद हो वही करें, लेकिन उसे एंजॉय करें। अगर उसे आप अपने दर्द का कारण बना लेंगे तो आसपास के लोग भी दुखी होंगे।
दरअसल, सभी स्वार्थी होते हैं
दुनियामें सेल्फलेस कोई नहीं होता। सभी में स्वार्थ होता है, आपकी भावना आपके अंदर से रही है तो स्वार्थी होगी ही। बस यह देखना होता है कि आपकी भावना कंजूस है या उदार। यहां कंजूस को \\\"कम-जूस\\\' समझिए। दरअसल आज लोगों के अंदर इतना जूस ही नहीं है कि सभी लोगों के प्रति प्रेम की भावना रख सकें। पैसों से आप दाे लोगों का ध्यान रख सकते हैं लेकिन बिना पैसे के कई लोगों के प्रति अच्छी भावना रखी जा सकती है। दरअसल प्रेम की मिठास तभी है जब वह किसी व्यक्ति विशेष के लिए हो। तभी हमारी जिंदगी खूबसूरत होगी।
ड्यूटीवो है जो मजबूरी में करते हैं
कईलोग बहुत सारे काम ड्यूटी की तरह करते हैं। दरअसल, ड्यूटी क्या है यह किसी को नहीं पता। जब आप कोई ऐसा काम करते हैं जो आप करना नहीं चाहते तो उसे ड्यूटी कहते हैं। इसी तरह असली आजादी के मायने भी लोग गलत समझ लेते हैं। आजादी का मतलब यह नहीं है कि वही किया जाए जो मन करे, बल्कि इसका मतलब ये है कि जिस काम को भी आप करें उसे खुश होकर किया जाए।
किसीके बारे में राय बनाएं
इंसानपल-पल बदलने वाला जीव है। इसलिए कभी किसी के प्रति राय नहीं बनानी चाहिए। किसी से रोज भी मुलाकात हो तो उसे एक नए अंदाज में देखिए। इसे प्रैक्टिस करने की जरूरत नहीं है। लोग जिंदगी को खुद कॉम्प्लिकेट करते हैं। मसलन अगर आपको कभी किसी की कोई बात बुरी लगती है तो आप उसपर पहले इल्जाम लगाते हैं, फिर उसे माफ करते हैं। मेरा मानना है कि इल्जाम लगाने से पहले ही अगर ये सोचा जाए कि वो इल्जाम क्यों लगा रहा है? क्या उसमें थोड़ी भी सच्चाई है या किसी गलतफहमी की वजह से ऐसा है। तो खुद ही समस्याएं सुलझ जाएंगी।
जोआपके पास है, एंजॉय करें
शेरयह बैठकर चिंता नहीं करता कि अच्छा शेर कैसे बनूं। लेकिन मनुष्य जहां है, उससे ज्यादा पाने की चाहत उसमें हमेशा होती है। इसमें कोई बुराई नहीं है। पर लोग बेहतर बनने के लिए किसी को कमतर नहीं देखना चाहिए। लोग इस बात से खुश या संतुष्ट नहीं होते कि उनके पास क्या है? बल्कि इस बात से खुश होते हैं कि सामने वाले के पास क्या नहीं है।
साइंटिफिकहै भारतीय संस्कृति
आजका युवा पाश्चात्य हो रहा है। हम एक हजार साल से गुलाम है। हमारी सोच भी वैसी ही हो गई है। अंग्रेजों के अधीन रहने वाली पीढ़ी अब खत्म हो रही है। लेकिन युवा पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता के बारे में ज्यादा सोच रही है। जबकि यही एक संस्कृति है जो बहुत सोच-विचार कर साइंटिफिक तरीके से बनाई गई है। यहां आपको प्रश्न पूछने का हक है। इस संस्कृति में घर के 5 लोगों को अलग-अलग भगवान की पूजा करने की आजादी है। सब अपने हिसाब से जी सकते हैं। यह बेहद खूबसूरत चीज है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त आर. परशुराम उनकी प|ी।
बाएं से अनिल माधव दवे, इकबाल सिंह बैंस उनकी प|ी।
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