अफसर अब भी उदासीन
जबइन कर्मचारियों द्वारा कई बार आवेदन देने के बाद भी बात नहीं बनी तो इनमें से राकेशचंद्र श्रीवास्तव ने वर्ष 2001 में हाईकोर्ट की शरण ली। नौ साल तक केस चला और 20 अगस्त 2009 को डबल बैंच का फैसला आया कि राकेशचंद्र को 17 जनवरी 1997 की तारीख से ही सब इंजीनियर के पद पर नियमित किया जाए। लेकिन अफसरों पर इस निर्णय का भी कोई असर नहीं हुआ। यहां तक कि हाईकोर्ट ने आदेश नहीं मानने के कारण महापौर और तत्कालीन कमिश्नर पर एक-एक हजार रुपए का जुर्माना ठोका, उसके बाद भी आदेश नहीं माना। हाल ही में सब इंजीनियर के तीन पद खाली हुए हैं तो इनकी उम्मीद फिर जागी, लेकिन इस मामले को लेकर अफसर उदासीन दिख रहे हैं।
सीएमहेल्पलाइन का गोलमोल
हालही में इन्होंने पूरे मामले की शिकायत सीएम हेल्पलाइन में की है। वहां से जवाब आया कि राकेशचंद्र को तो पहले ही नियमित किया जा चुका है। लेकिन इस जवाब में कहीं भी हाईकोर्ट के निर्देश का जिक्र नहीं है, जबकि राकेशचंद्र ने सीएम हेल्पलाइन को की गई शिकायत में हाईकोर्ट के आदेश का स्पष्ट उल्लेख किया था। इतना ही नहीं इस पूरे मामले में तत्कालीन प्रमुख सचिव राघव चंद्रा ने भी लिखा था कि कोर्ट के निर्देशानुसार कार्रवाई की जाए। इतना ही नहीं तत्कालीन आयुक्त मनीष सिंह के पास हुई एक सुनवाई में उन्होंने फैसला दिया था कि राकेशचंद्र उपयंत्री पद के लिए योग्य उम्मीदवार हैं और इन्हें समय आने पर सब इंजीनियर बनाया जाएगा।
पक्षपात हुआ
राकेशंचद्र श्रीवास्तव के मामले में अफसर दबी जुबान में कहते हैं कि ये हाईकोर्ट नहीं जाते तो शायद अब तक सब इंजी. बन गए होते। लेकिन राकेशचंद्र के अलावा जयप्रकाश गुप्ता और बलविंदर पाल सिंह अहलुवालिया कोर्ट नहीं गए, फिर भी ये हक से वंचित हैं।
वरिष्ठ अफसरों से बात करें
मैंइस मामले में कुछ नहीं बता पाऊंगा। आप मेरे वरिष्ठ अफसरों से संपर्क करें।
फरीदकुरैशी, ओएसडी,सामान्य प्रशासन शाखा, ननि
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