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फायर लाइन होती तो नहीं जलते ये पेड़

7 वर्ष पहले
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वनविभाग द्वारा प्रतिवर्ष बारिश के बाद घास अन्य खरपतवार को नष्ट करने के लिए आग लगाई जाती है। इसे फायर प्रोटेक्शन प्रोग्राम कहा जाता है और इसे कंट्रोल फायरिंग के नियमों को ध्यान में रखकर अंजाम दिया जाता है। इसके तहत आग लगाने के पहले एक गड्ढा खोदकर उसमें कचरा जमा करते हैं, ताकि आग पर नियंत्रण रहे। यह सब जिम्मेदारों की देख-रेख में किया जाता है। लेकिन ईको-लाॅजिकल पार्क में इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया और दर्जनों आंवले के पेड़ जल कर नष्ट हो गए।

इसलिएभी खास है यह पार्क

इसपार्क के 15 हेक्टेयर क्षेत्र में दशमूल का निर्माण किया जा रहा है। इसके तहत यहां 1-1 हजार पौधे रोपने का लक्ष्य है। इनमें से कई पौधे प्रदेश में कहीं भी नहीं पाए जाते। फॉरेस्ट अफसरों के अनुसार औषधि पौधे लगाए जा रहे हैं। दशमूल क्षेत्र में एक भूखंड पर एक ही प्रकार के औषधि पौधे रहेंगे।

इनपौधों का ज्यादा महत्व

मस्तिष्करोग, हृदय रोग ब्लड प्रेशर, पेट दर्द, मिर्गी, सिर दर्द जैसी बीमारियों के लिए ब्राह्म, शंखपुष्पी, अर्जुन, देवशेमल, कालमेघ, चिरायता, गिलोय हडज़ोड़, अडूसा आदि औषधि के पौधे यहां रोपे गए हैं। इन पौधों का विभिन्न रोगों में उपचार के लिए औषधि के रूप में उपयोग किया जाता है।

मैं जांच करवाता हूं

हमआग लगाने के दौरान फायर लाइन बनाते हैं। वहां इसका पालन क्यों नहीं हुआ मैं पता करवाता हूं। जरूरत पड़ी तो जांच भी करवाऊंगा।

एल.कृष्णमूर्ति, डीएफओ,भोपाल

नियमों का ध्यान रखते तो ऐसा नहीं होता

आगलगाने के पहले फायर लाइन बना दी जाती तो पेड़ों काे जलने से बचा सकते थे। वैसे भी यह काम जनवरी से मार्च के दौरान किया जाता है। अभी क्यों हो रहा है, यह समझ से परे है।

डीकेदुबे, रिटायर्डसहायक वन संरक्षक

आगे ऐसा हो

हमसुबह मॉर्निंग वॉक पर गए तो देखा कि आंवले के पेड़ जल रहे हैं। ऐसा लगता है कि रात में ही आग लगा दी गई थी। सुबह वहां कोई नहीं था। हम लोग तो यही चाहते हैं कि आगे से ऐसा हो, क्योंकि ये उपयोगी पेड़-पौधे हैं।

हरिखोलवाल, सैरपर आने वाले