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पितरों की आत्मा की शांति के लिए है पितृपक्ष

7 वर्ष पहले
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पितरोंको तृप्त करने के लिए जल चढ़ाने का क्रम 9 सितंबर से शुरू हो चुका है। इसी पखवाड़े में पूर्वज तृप्त होने के लिए धरती पर उतरते हैं। हिन्दू रीति-रिवाजों एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों की आत्मा की शांति एवं मुक्ति के लिए पिंडदान अहम कर्मकांड है।

वैदिक पं. विनोद तिवारी के अनुसार अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष या महालय पक्ष कहा जाता है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में आसपास रहते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। पिंडदान कई धार्मिक स्थानों पर होता है, परंतु सबसे उपयुक्त स्थल बिहार के गया को माना जाता है।

पितृपक्षमें ही श्राद्ध क्यों

कीमूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए, वह श्राद्ध है। पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्रद्धा द्वारा हविष्ययुक्त (पिंड) प्रदान करना ही श्राद्ध कहलाता है। ऐसा करने से पितर संतुष्ट होते हैं।

कैसेकरें तर्पण

तर्पणदोनों हाथों से करना चाहिए, पर श्राद्ध केवल दाहिने हाथ से। तर्पण जल में खड़े होकर ही करना चाहिए। अगर जलाशय नहीं है, तो स्नान कर सीधे गीले बदन तर्पण करें। स्नान-तर्पण, ग्रहण, महालय, तीर्थ-विशेष में तो तिल से तर्पण का कोई निषेध नहीं है, लेकिन शुक्रवार, रविवार, संक्रांति आदि में तिल का तर्पण निषेध है। ज्योतिर्विद के अनुसार सुबह स्नान कर देव स्थान पितृ स्थान को गाय के गोबर से लीप कर गंगाजल से पवित्र करें। फिर घर के आंगन में रंगोली बनाएं। महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं। ब्राह्मण से ही कार्य कराएं।

{हथाईखेड़ा सहित कई जगह दिया जा रहा है पितरों को पानी