हिंदी दिवस आज
भाषा से होती है स्थान की पहचान : दुबे
जहां एक ओर खान, पान, पहनना-ओढ़ना, रूप रंग, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज आदि किसी भी भू भाग के पहचान चिन्ह होते हैं, वहीं दूसरी ओर चाहे वह आंचलिक परिवेश हों या अंतर्राष्ट्रीय, बोली या भाषा उसकी भौगोलिक या ऐतिहासिक पहचान होती है। यह बात
भेल हिंदी साहित्य परिषद के अध्यक्ष सुभाष दुबे ने बताई। उन्होंने िहंदी दिवस के वारे में प्रकाश डालते हुए बताया कि जैसे मालवा-मालवी, हरियाणा-हरियाणवी, हिंदुस्तान-हिंदुस्तानी, जापान-जापानी, चीन-चीनी, रूस-रूसी आदि भाषाएं भौगोलिक या ऐतिहासिकता के साथ भाषा की पहचान है। इस आधार पर ही हिंदी अंतर्राष्ट्रीय पहचान और संस्कृति का प्रतीक के साथ गरिमा का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि ऐसे जटिल मुद्दों पर एकदम आते हुए एक मूल प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि अभिव्यक्ति, संप्रेषण और संपर्क के संदर्भों में इस भारत के भू भाग की सरल, सर्वव्यापी परस्पर प्रेम की भाषा कौन हो सकती है।
होतारहा िवरोध
श्रीदुबे ने कहा िक हिंदी के प्रति विद्वेष विरोध की आवाज क्यों उठती रहती है। यह एक विचारणीय प्रश्न है। इसके तर्क और वितर्क में कई तर्क पूर्ण और तथ्यपूर्ण विचार सकते हैं। इन विचारों का विश्लेषण किया जा सकता है। सुभाष दुबे के अनुसार क्या यह वही प्रक्रिया नहीं होगी, जिसकी पुनरावृत्ति हम करते आए हैं और ऐसे अन्य संवेदनशील प्रश्नों के समान ही यह प्रश्न भी वैसा हो जो सामने की पंक्ति में खंभा खड़ा हो।
िहंदीउत्सव आयोजित
हिंदीप्रचार प्रसार की दिशा में अधिनियम बना और समय-समय पर सरकारी फरमान भी जारी हुए। 14 सितंबर प्रतिवर्ष हिंदी उत्सव के रूप में आता है। वातावरण निर्माण के उद्देश्य से व्याख्यानों, प्रदर्शनियों, प्रतियोगिताओं आदि का आयोजन होता है। इससे हिंदी का माहौल भी बन जाता है, लेकिन क्या यह हिंदी याद रहती है। इस दिवस के आसपास ही आयोजन होते हैं। दिसंबर या जनवरी माह में इस संबंध में कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं होते हैं। हिंदी व्यवहार का प्यार चाहती है।
{भेल हिंदी साहित्य परिषद के अध्यक्ष से बातचीत