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घाटों पर पितरों को तर्पण देने का सिलसिला जारी

7 वर्ष पहले
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पितरों की आत्मा को तृप्त करने के लिए जल चढ़ाने का क्रम 9 सितंबर से शुरू हो चुका है। पितरों को जल चढ़ाने वाले श्राद्घ करने वाले परिवार 24 सितंबर तक पूरी तरह सात्विक रहेंगे। पुराने शहर के गिन्नौरी मंदिर, शीतलदास की बगिया, काली घाट मंदिर, खटलापुरा घाट पर रोजाना सुबह से ही निमित्त जल तिल आदि से तर्पण का सिलसिला चल रहा है।

मान्यता है कि इसी पखवाड़े में पूर्वज तृप्त होने के लिए धरती पर उतरते हैं। हिन्दू रीति-रिवाजों एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों की आत्मा की शांति एवं मुक्ति के लिए पिंडदान अहम कर्मकांड है।

पूर्वजदेते हैं आशीर्वाद

वैदिकपं. विनोद तिवारी के अनुसार अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष या महालय पक्ष कहा जाता है। पितृपक्ष दरअसल अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने, उनका स्मरण करने और उनके प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति करने का महापर्व है। इस अवधि में पितृगण अपने परिजनों के समीप विविध रूपों में आसपास रहते हैं और अपने मोक्ष की कामना करते हैं। परिजनों से संतुष्ट होने पर पूर्वज आशीर्वाद देकर हमें अनिष्ट घटनाओं से बचाते हैं। पितृपक्ष में लोग पिंडदान करते हैं। वैसे तो पिंडदान कई धार्मिक स्थानों पर होता है, परंतु सबसे उपयुक्त स्थल बिहार के गया को माना जाता है। इसके चौदह दिन तक लोग अपने पुरखों को तर्पण देते हैं।

कैसे करें तर्पण

तर्पण दोनों हाथों से करना चाहिए, पर श्राद्ध केवल दाहिने हाथ से। तर्पण जल में खड़े होकर ही करना चाहिए। अगर जलाशय नहीं है, तो स्नान कर सीधे गीले बदन तर्पण करें। स्नान-तर्पण, ग्रहण, महालय, तीर्थ-विशेष में तो तिल से तर्पण का कोई निषेध नहीं है, लेकिन शुक्रवार, रविवार, संक्रांति आदि में तिल का तर्पण निषेध है।

>पुराने शहर के घाटों तालाबों सहित कई जगह दिया जा रहा है पितरों को पानी