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खुद के सवालों में उलझे लाेग

7 वर्ष पहले
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भारतभवन में रविवार को रंगमंडल की अतिथि नाट्य प्रस्तुति के तहत नई दिल्ली के बहरूप आर्ट ग्रुप की ओर से नाटक ‘चौराहा’ का मंचन किया गया। सुमन कुमार के निर्देशन में युवा कलाकारों ने अपने ही सवालों में उलझे मिडिल क्लास लोगों की कहानी को बयां किया। नाटक के लेखक मकरंद सेठी की इस रचना में आज की सामाजिक परिस्थितियों को प्रस्तुत किया गया। इसमें एक तरफ सभी के मन में कई सवाल हैं तो दूसरी तरफ विरोधाभास।

नाटकका स्टोरी प्लॉट

नाटककी कहानी कुछ इस तरह है कि किसी चौराहे पर लगे ट्रैफिक जाम में कई मुसाफिर फंसे होते हैं। यहां दंगों बाद के माहौल को दिखाने की कोशिश की गई है। एक तरफ इलाके में दंगे होने की आशंका है। वहीं, दूसरी ओर दंगे शांत होने से राहत भी है। इस दौरान बस में सवार एक महिला की उलझन समझ में आती है। वहीं, कार में बैठे पति-प|ी के बीच विरोधाभास पर नजर जाती है। जब विरोधाभास बढ़ने लगता है, तब उनके बीच झगड़ा बढ़ जाता है। इसमें दंगों के पीछे छिपे कारणों को लेकर लोगों के बीच छींटा-कसी होती है। वहीं, नाटक में दंगों के वक्त कठपुतली की तरह इस्तेमाल होने वाले लोगों को भी दिखाया गया है।

मंच पर, मंच से परे

मंच पर इंतखाब आलम, हिमांशु कुमार, हादी, चंद्रभान प्रताप यादव आदि ने अभिनय किया। वहीं, मंच से परे अनुज, अशोक, अनुपमा, ऋचा सहित अन्य ने सहयोग किया।

स्टूडेंट्स का ग्रुप है बहुरूप

बहरूप आर्ट ग्रुप में ज्यादातर आर्टिस्ट्स जेएनयू, नई दिल्ली के अलग डिपार्टमेंट्स के स्टूडेंट्स हैं। ग्रुप मेंबर विपुल बताते हैं कि उनके थिएटर से जुड़ने का मकसद है कि वे अलग-अलग तरह के लोगों से जुड़ सकें।

भारत भवन में रविवार को मंचित नाटक \\\"चौराहा\\\" का एक दृश्य।

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