पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • डीबी स्टार भोपाल इंंदौर

डीबी स्टार भोपाल/इंंदौर

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
डीबी स्टार >भोपाल/इंंदौर

नशेके खिलाफ जागरुकता अभियान से जुड़े कार्यक्रमों पर सरकार लाखों रुपए खर्च कर रही है। दूसरी तरफ नशे के शिकार लोगों के पुनर्वास और अन्य मानसिक रोगों से उन्हें छुटकारा दिलाने के लिए उसके पास कोई विकल्प नहीं है। ऐसे में शराब, तंबाकू और अन्य दुर्व्यसन के आदी चाहकर भी इस मर्ज से मुक्त नहीं हो पाते हैं। मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों को इलाज के लिए मजबूरन निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। नियमानुसार हर जिला चिकित्सालय में एक मनोरोग चिकित्सक (साइकियाट्रिस्ट) की नियुक्ति होना चाहिए, लेकिन पूरे प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 12 ही मनोरोग चिकित्सक पदस्थ हैं। संभाग के आठ जिलों इंदौर, धार, खरगोन, बुरहानपुर, खंडवा, झाबुआ, बड़वानी और अालीराजपुर में से बड़वानी को छोड़ कहीं के भी अस्पताल में मनोरोग चिकित्सक नहीं हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने आखिरी बार वर्ष 2005 में सिर्फ 3 पदों पर साइकियाट्रिस्ट की भर्ती की थी। अफसरों का कहना है कि खाली पदों को जल्दी भरा जाएगा।

तीनतरह की थैरेपी से इलाज

जीबीपंत जिला चिकित्सालय इंदौर में भी कोई साइकियाट्रिस्ट नहीं है। यहां तंबाकू नियंत्रण प्रोग्राम के तहत केवल काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध है, जबकि जानकारों के मुताबिक हर तरह के नशे के खिलाफ काउंसलिंग के साथ तीन तरह की थैरेपी से इलाज किया जाता है। इसमें एवरजन थैरेपी, सब्सटिट्यूट थैरेपी और साइकोलॉजिकल थैरेपी शामिल है। एवरजन थैरेपी में मरीज को ऐसी ड्रग दी जाती है, जिसेे लेने पर उसे परेशानी हो। सब्सटिट्यूट थैरेपी में नशीली वस्तुओं को रिप्लेस किया जाता है। जैसे- तंबाकू छोड़ने के लिए निकोटिन च्युइंगम, निकोटिन इन्हेलर आदि दी जाती है। इसके जरिए मरीज को ज्यादा टॉक्सिन से कम टॉक्सिन की तरफ ले जाया जाता है। साइकोलॉजिकल थैरेपी में नशा छोड़ने पर मरीज को घबराहट होती है। इसके अलावा भूख नहीं लगना, एकाग्रता भंग होना, बेचैनी महसूस होना आदि शिकायतें सामने आती हैं।