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बिना इस्तेमाल के बर्बाद हुईं इमारतें

7 वर्ष पहले
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रायसेनरोड पर आदमपुर छावनी गांव है। इसी गांव से सटकर एक विशाल इमारत बनी है, जिसके आसपास जर्जर भवन हैं। यहां बड़ी मुश्किल से एक बोर्ड दिखाई दिया, जिस पर धुंधले से अक्षरों में लिखा है यह ग्रामोद्योग परिसर आदमपुर है। यह बिल्डिंग रेशम संचालनालय की है। लेकिन अब यह कहने के लिए बिल्डिंग रह गई है, इसके आसपास तो केवल अवशेष बचे हैं। दरअसल यहां रेशम संचालनालय द्वारा वर्ष 1998 में रेशम उत्पादन केंद्र बनाया गया था। इस इमारत का निर्माण जिला ग्रामीण विकास अभिकरण परियोजना द्वारा विकास विकल्प झांसी से करवाया गया था। तब इसकी लागत करीब 20 लाख रुपए आई थी, लेकिन बाद में इसको लेकर कई आपत्तियां उठाई गईं। इस कारण इसमें दफ्तर ही शुरू नहीं हो पाया। शेषपेज 3

रिनोवेशन के बिना नहीं ले रहे

बिल्डिंग बनी, ही पार्क

राजभवन के सामने भी एक अधूरा ढांचा खड़ा हुआ है। यहां भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल द्वारा अस्पताल और रिसर्च सेंटर बनाया जाना था। इसके लिए नींव भरकर पिलर भी खड़े कर दिए गए थे। इसे मिनी यूनिट क्रमांक 6 नाम दिया गया था, लेकिन राजभवन की सुरक्षा को ध्यान में रखकर इसे बनने से रोक दिया गया। क्योंकि यहां अस्पताल बनने से भीड़ होती और राजभवन की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती। सवाल यह उठता है कि यह बात तो पहले भी पता थी, तब क्यों आपत्ति नहीं ली गई और अब रोक लगा दी? प्रशासन की उदासीनता के चलते ढांचे में लगे लोहे के सरिए और अन्य सामग्री खराब हो रही है।

रेशम संचालनालय की यह इमारत तो एक नमूना भर है। राजधानी और उसके आसपास कई ऐसी इमारतें हैं, जो मेंटेनेंस और इस्तेमाल नहीं होने के कारण खराब होने लगी हैं। हद तो यह है कि किसी भी इमारत की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है। रेशम संचालनालय वाली इमारत बनने के बाद काम नहीं शुरू हो पाने की दो मुख्य वजह हैं। पहली तो यहां पानी नहीं है और दूसरी यहां अतिक्रमण ज्यादा है। अब इस इमारत को एक नई संस्था को सौंपे जाने की तैयारी है, लेकिन वह भी बिना रिनोवेशन इसे लेने को तैयार नहीं है।