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नकारात्मकता है स्वयं से रूठना : स्वामी अवधेशानंद
भोपाल | जूनापीठाधीश्वरस्वामी अवधेशानंद गिरि ने सोमवार को श्रीमद भागवत कथा के प्रसंगों के माध्यम से जीवन जीने की कला सीखने के गुर बताए।
रवींद्र भवन के मुक्ताकाश मंच से उन्होंने कहा कि कई बार व्यक्ति स्वयं से ही रूठकर बैठ जाता है। यह स्थिति तब आती है, जब उसके मन में नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। इसके पीछे मूल कारण यह होता है कि व्यक्ति की कामनाओं का कोई अंत नहीं होता है। उनके पूरा होने पर वह दुखी होता है। उन्होंने कहा कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए हमें विचारवान बनना चाहिए।
स्वामीजी ने कहा कि विचार से समाधान आते हैं, पर हमारे पास विचार करने का समय नहीं है। हम सद् विचारों को अपने भीतर प्रवेश दें, उन्हें आत्मसात करें तो बहुत सारी समस्याओं का अंत हम स्वयं कर सकते हैं। हमारे सारे दुख स्थूल हैं। भागवत कथा को सुनें। जीवन में बदलाव आने लगेगा। उन्होंने कहा कि सुख मरीचिका की तरह होता है। हम जितना इसके निकट जाते हैं, उतना यह हमसे दूर होता है।