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कर्म सृृष्टि का मूल बीज है : स्वामी अवधेशानंद
भोपाल| स्वामीअवधेशानंद गिरि ने गुरुवार को रवींद्र भवन के मुक्ताकाश मंच से कहा कि कि कर्म ही सृृष्टि का मूल बीज है। हमारे कर्मों में ही सुख-दु:ख, हानि-लाभ, जय-पराजय, जन्म-मृृत्यु और हमारे द्वन्द छिपे हुए हैं। कर्म विधान पर विचार करते हुए सद्पुरुषों ने मनुष्य को आगाह किया है कि निषिद्ध कर्मों से जीवन में दु:ख, त्रास और वेदना आती है। मनुष्य को वे कर्म करना चाहिए जिनसे सिद्धि मिले और वे लोक हित में हों। उन्होंने गाय और उसके दूध के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
कथा के पांचवें दिन स्वामी जी ने कहा कि संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य ही ऐसा है जिसे कर्म और चिंतन की स्वतंत्रता प्राप्त है। हम यज्ञ देवताओं को अपना ऋणी बनाने के लिए करते हैं। तभी तो वे समय आने पर ऋण लौटाते हैं और हमारा जीवन फलता-फूलता है। पर्यावरण के साथ सहकार का नाम ही यज्ञ है। हमारे समय में गौ, गुरु, गंगा, गायत्री और गीता ये पांच ही ऐसे साधन हैं जिनके माध्यम से हम प्रकृृति में छिपे देवत्व को प्राप्त कर सकते हैं। ये ऐसे साधन हैं जो धरती और आकाश के बीच संतुलन बनाए रख सकते है। संयोजक अजय सिंह ने स्वामीजी स्वागत किया। कथा का समापन 14 फरवरी को होगा।
रवींद्र भवन में भागवत कथा सुनाते स्वामी अवधेशानंद गिरि।