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अनाज खरीदी पर बोनस को लेकर पसोपेश में सरकार

7 वर्ष पहले
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2009-10 50 19.03

2010-11 100 35.00

2011-12 100 85.00

2012-13 100 63.00

2013-14 150 72.00

(बोनस-रुपए में और खरीदी-लाख मीट्रिक टन में)

केंद्र सरकार ने आखिरी बार 2007-08 में 100 रुपए बोनस दिया था। इसके बाद से मप्र ही बोनस की घोषणा कर रहा है। जिसके कारण अनाज की खरीदी साल-दर-साल बढ़ी।

पीडीएस कोटे से ज्यादा अनाज की खरीदी पर राज्य को ही वह अनाज बाजार में बेचना पड़ेगा। इसमें नुकसान और खर्च की संभावना बढ़ेगी। परिस्थितियां राज्य सरकार के अनुकूल रहती हैं और सारा सरप्लस अनाज बाजार में बिक भी जाता है तब भी 1200 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।

प्रदेश में आगामी दिनों में निकाय चुनाव होने हैं। राज्य में 14 लाख से ज्यादा किसान हैं और यदि बोनस नहीं दिया जाएगा तो चुनावों पर उसका सीधा असर पड़ सकता है। राज्य सरकार बोनस देने का निर्णय लेती है तो सीधे तौर पर 1300 करोड़ रुपए बोनस के और 1200 करोड़ रुपए अतिरिक्त गेहूं खरीदने का बोझ पड़ेगा।

विशेष संवाददाता | भोपाल

प्रदेशमें निकाय चुनाव निकट हैं और एक अक्टूबर से धान और मक्का की खरीदी भी शुरू होने वाली है, ऐसे में राज्य सरकार यह निर्णय नहीं ले पा रही है कि इस बार समर्थन मूल्य पर होने वाली अनाज की खरीदी में प्रति क्विंटल बोनस की घोषणा करे या करे। हाल ही में खाद्य विभाग ने शासन को बता दिया है कि बोनस देने पर करीब ढाई हजार करोड़ रुपए का बोझ उठाना पड़ सकता है। इतना ही नहीं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) कोटे के 34 लाख टन से अतिरिक्त अनाज खरीदने के लिए राज्य सरकार को करीब सात हजार करोड़ रुपए जुटाने होंगे। इस बीच बोनस से संबंधित फाइल मुख्यमंत्री को भेज दी गई है।

केंद्र सरकार ने जून में राज्यों को पत्र लिखकर कहा था कि समर्थन मूल्य पर की गई अनाज की खरीदी का केंद्र की ओर से उतना ही पैसा दिया जाएगा, जितना उस राज्य में पीडीएस कोटा है। इसके अतिरिक्त जितनी भी खरीदी होगी, उसका भार राज्यों को ही उठाना होगा। इसी के बाद प्रदेश के खाद्य विभाग ने नफा-नुकसान का आंकलन करके शासन को रिपोर्ट सौंपी है। केंद्र सरकार के रूख के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि राज्यों की ओर से बोनस की घोषणा करने के बाद समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीदी में बेतहाशा वृद्धि हुई है। राज्य अनाज खरीदने के बाद भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) पर दबाव बनाने लगे। ताकि जल्द से जल्द के